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रायपुर। देश भर में नए आपराधिक कानून (BNSS) लागू हो चुके हैं। पुलिस की जांच अब सिर्फ गवाहों के बयानों पर नहीं, बल्कि 'फॉरेंसिक साक्ष्यों' (Forensic Evidence) पर टिक गई है। हत्या, साइबर क्राइम से लेकर संगठित अपराधों तक में सजा दिलाने के लिए राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) की रिपोर्ट ही सबसे बड़ा हथियार है। लेकिन छत्तीसगढ़ में सिस्टम का खेल देखिए! जिस अति-संवेदनशील और वैज्ञानिक संस्था को चलाने के लिए MSc-PhD और 15 साल का साइंटिफिक तजुर्बा चाहिए, वहां एक 'आर्ट्स' (MA) पढ़े रिटायर्ड पुलिस अफसर को कुर्सी पर बैठा दिया गया है।
रसूख के आगे नियम-कायदे सब फेल
सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि 2025 में सीआईडी (CID) से रिटायर हुए इस अफसर पर यह मेहरबानी विशुद्ध रूप से उनके तगड़े रसूख का नतीजा है। रिटायरमेंट के तत्काल बाद उन्हें एफएसएल में संविदा नियुक्ति दे दी गई। सवाल यह उठ रहा है कि क्या राज्य के एफएसएल विभाग में कोई एक भी योग्य वैज्ञानिक नहीं था, जिसे प्रमोट कर यह जिम्मेदारी दी जा सके? विभागीय अधिकारियों की अनदेखी कर एक बाहरी और गैर-तकनीकी व्यक्ति को थोप दिए जाने से लैब के वैज्ञानिकों में भारी आक्रोश है।
राजपत्र के नियमों की सरेआम उड़ी धज्जियां
एफएसएल कोई सामान्य थाना या प्रशासनिक दफ्तर नहीं है कि इसे डंडे के जोर पर चलाया जा सके। यह विज्ञान का क्षेत्र है। राजपत्र (Gazette) के सख्त नियम कहते हैं कि इस पद पर बैठने वाले के पास:
1.. रसायन, भौतिकी, प्राणी शास्त्र या फॉरेंसिक साइंस में M.Sc. और Ph.D. होनी चाहिए।
2..आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण में 15 साल का लैब अनुभव होना चाहिए।
3..अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिसर्च पेपर पब्लिश होने चाहिए।
लेकिन, वर्तमान में बैठे साहब का बैकग्राउंड 'कला संकाय' (Arts) का है। उनके पास MA की डिग्री है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति ने विज्ञान की ABCD नहीं पढ़ी, वह DNA प्रोफाइलिंग, बैलेस्टिक्स (हथियारों की जांच) और टॉक्सिकोलॉजी (जहर की जांच) जैसी बेहद जटिल और माइक्रो-लेवल की रिपोर्ट को कैसे समझेगा और कैसे अप्रूव करेगा?
कोर्ट में मचेगा बवाल, अपराधियों की होगी चांदी!
कानूनी जानकारों और विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि इस गैर-वैज्ञानिक नियुक्ति से पूरा सिस्टम कोलैप्स हो सकता है। जब यह फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में पेश होगी, तो बचाव पक्ष का वकील सबसे पहले लैब के मुखिया की योग्यता पर ही सवाल उठाएगा। अगर अप्रूविंग अथॉरिटी ही टेक्निकली अनक्वालिफाइड है, तो रिपोर्ट की विश्वसनीयता शून्य हो जाएगी। इसका सीधा फायदा संगीन अपराधियों को मिलेगा और वे सबूतों के अभाव में छूट जाएंगे। दूसरी तरफ, साहब के पास तकनीकी विजन न होने के कारण लैब के कई अहम अपग्रेडेशन प्रोजेक्ट्स फाइलों में धूल फांक रहे हैं और पेंडेंसी बढ़ती जा रही है।
अब गृह विभाग के पाले में गेंद
एफएसएल के अंदरखाने से उठी यह चिंगारी अब मंत्रालय तक पहुंच चुकी है। कर्मचारियों ने इस 'सिस्टमैटिक गड़बड़ी' की लिखित शिकायत उच्च स्तर पर की है। गृह विभाग के संयुक्त सचिव रमेश शर्मा ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए कहा है, हमें इस विषय में एक शिकायत पत्र प्राप्त हुआ है। मामले की बारीकी से जांच करवाई जाएगी और जो भी आवश्यक कार्रवाई होगी, वह की जाएगी।