
बिलासपुर। आबकारी विभाग के बाबू दिनेश दुबे के रसूख के आगे व्यवस्था नतमस्तक नजर आ रही है। आय से अधिक संपत्ति मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की पूरी कार्रवाई सवालों के घेरे में आ गई है। मिर्जा शौकत बेग की शिकायत पर एसीबी ने छापा मारा था। इसके बाद उप पुलिस अधीक्षक अजितेश कुमार सिंह ने अपराध क्रमांक 5/18 के तहत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13(1)(ए) और 13(2) में मामला दर्ज किया।
मगर खेल इसके बाद शुरू हुआ। मामले में एसीबी ने अदालत में खात्मा रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) पेश कर दी और वह भी बिना आय की सही गणना किए। दिनेश की काली कमाई से अर्जित अवैध अचल संपत्तियों को इस रिपोर्ट में दर्शाया ही नहीं गया। नियम है कि खात्मा रिपोर्ट पेश करते वक्त शिकायतकर्ता का पक्ष सुना जाना आवश्यक है। उसे आपत्ति का मौका मिलना चाहिए, मगर शौकत बेग को सुनवाई का मौका ही नहीं दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का लिया सहारा, फिर भी हो गया 'समझौता'
सुनवाई का मौका न मिलने पर शिकायतकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के 2007 के एक फैसले (आपराधिक अपील संख्या 1453/2007, संजय बंसल एवं अन्य बनाम जवाहरलाल वत्स एवं अन्य) का आधार लेते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत याचिका पेश की गई। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर की जा सकती है और मजिस्ट्रेट स्वतंत्र रूप से उस पर विचार करेगा। इसके आधार पर शौकत बेग ने कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कुछ समय बाद ही अपनी याचिका वापस ले ली।
अब बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर बिना संपत्तियों की गणना किए रिपोर्ट कैसे पेश हो गई? शिकायतकर्ता, जो कानूनी लड़ाई लड़ रहा था, वह अचानक बाबू दिनेश दुबे के भौकाल के सामने कैसे झुक गया? पर्दे के पीछे ऐसा क्या हुआ कि शिकायतकर्ता ने अपने कदम वापस खींच लिए?
पुराना है भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा:
पीएमओ तक हो चुकी है शिकायत
यह पहली बार नहीं है जब यह आबकारी बाबू जांच के घेरे में आया हो। दिनेश दुबे के खिलाफ पूर्व में भी बड़ी कार्रवाई हो चुकी है। सबसे पहले 12 अगस्त 2017 को तत्कालीन रिटायर्ड सहायक आयुक्त (आबकारी) पीसी अग्रवाल ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में इस बाबू की बेहिसाब संपत्ति की शिकायत की थी। उस शिकायत के बाद एसीबी ने एफआईआर दर्ज की थी। आबकारी उड़नदस्ता में पदस्थ तत्कालीन सहायक आयुक्त वीआर लहरे ने जांच की थी, जिसमें प्रमाणित हुआ था कि बाबू ने पद का दुरुपयोग कर करोड़ों की अवैध कमाई की है।
नोटबंदी में चपरासियों को बना दिया एटीएम
पुरानी जांच रिपोर्ट में यह सामने आया था कि बाबू ने अपनी काली कमाई खपाने के लिए नोटबंदी का भरपूर फायदा उठाया। 4 नवंबर 2016 से 29 दिसंबर 2017 के बीच सरकंडा एसबीआई में 16.71 लाख रुपये जमा किए और 15.64 लाख निकाले गए। पत्नी मीनाक्षी के खाते में 5.04 लाख और बेटे आदित्य के खाते में 3.90 लाख रुपये डाले गए।
विभाग के चपरासियों को तो एटीएम की तरह इस्तेमाल किया गया। चपरासी जीआर महार के खाते में 5.15 लाख, हीरालाल के खाते में 1.51 लाख, संतोष कुमार के खाते में 40 हजार और नरेश के खाते में 2 लाख रुपये खपा दिए गए। छोटी-बड़ी नकद रकम लगातार खातों में घूमती रही।
खड़ा किया बेतहाशा संपत्तियों का साम्राज्य
सरकारी नौकरी में आने के बाद एक छोटे से पद पर रहते हुए दिनेश ने बेतहाशा संपत्तियां बटोरी हैं। शहर के कुदुदंड में आलीशान मकान, गंगानगर में दो मंजिला घर, भारतीय नगर और व्यापार विहार जैसे पॉश इलाकों में संपत्तियां हैं। चकरभाठा के ग्राम चिचिरदा में दो बड़े फार्म हाउस और गृहग्राम पाराघाट (मस्तूरी) में लंबी-चौड़ी खेती की जमीन इसी बाबू के नाम पर दर्ज है।
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