रायपुर। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण की महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना एक के बाद एक बड़े खुलासे हो रहे हैं  ये पूरी योजना सुसंगठित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। विकास के नाम पर बिछे इस जाल में सफेदपोशों, भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों के सिंडिकेट ने सुनियोजित तरीके से करोड़ों रुपये की सरकारी राशि का गबन किया है। असली और पुश्तैनी किसानों को उनके हक का चार गुना मुआवजा आज तक नहीं मिला, जबकि बाहरी भू-माफियाओं ने सेटिंग के जरिए जमीनों को कागजों में छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर अपनी तिजोरियां भर लीं। राजनांदगांव के देवादा और टेडेसरा गांव के करीब 200 से अधिक किसान पिछले पांच सालों से न्याय की गुहार लगाते हुए अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुके हैं।

वीआईपी होटलों में रची गई 'ऑपरेशन लूट' की पटकथा

इस घोटाले की जड़ें सिस्टम में कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लूट की पूरी साजिश शहर के एक आलीशान होटल में रची गई। सूत्रों के मुताबिक, यह होटल उसी मुख्य भू-माफिया का है, जिसके उद्घाटन में इलाके के तत्कालीन एसडीएम बकायदा चीफ गेस्ट बनकर फीता काटने पहुंचे थे। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और ईओडब्ल्यू (EOW) की जांच में यह साफ हो रहा है कि इसी होटल की बंद कमरों की मीटिंगों में पटवारियों और आला अधिकारियों ने मिलकर असली पंचनामा रिपोर्ट को गायब किया और जमीनों का फर्जी बंटवारा कर दिया।

व्हिसलब्लोअर की जान को खतरा, साजिशों का दौर शुरू

जैसे-जैसे इस महाघोटाले की आंच तेज हो रही है, घोटाले के मास्टरमाइंड बौखला गए हैं। मामले को उजागर करने वाले शिकायतकर्ता की जान अब सीधे तौर पर खतरे में है। शिकायतकर्ता ने रायपुर, दुर्ग, धमतरी और महासमुंद के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को पत्र लिखकर तत्काल सुरक्षा मुहैया कराने की गुहार लगाई है। पत्र में गंभीर आशंका जताई गई है कि माफिया उन्हें झूठे एससी-एसटी एक्ट या छेड़छाड़ के मुकदमों में फंसा सकता है। इसके अलावा, किसी करीबी के जरिए नशीली दवा पिलाकर उनकी हत्या की साजिश रचे जाने की भी खुफिया जानकारी सामने आई है।

छले गए असली किसान: अपनों के ही सिस्टम में बेगाने

एक तरफ पाटन जैसे क्षेत्रों में प्रभावितों को दोगुनी से ज्यादा राशि मिली, वहीं राजनांदगांव के किसान अपने हक के लिए तरस रहे हैं। देवादा गांव के तीन प्रमुख मामलों से इस लूट का पैटर्न समझा जा सकता है:

  •  श्याम लाल देवांगन:** इनकी 1 एकड़ 27 डिसमिल पुश्तैनी जमीन छिन गई, लेकिन प्रशासन ने मुआवजे के नाम पर महज 28 लाख रुपये थमा दिए।
  •  सुरेश चतुर्वेदी: इन्हें भी समान जमीन पर सिर्फ 28-29 लाख मिले। जबकि इनके आसपास जमीन खरीदने वाले बाहरी लोगों (जो किसान थे ही नहीं) ने रातों-रात उसी जमीन के टुकड़े कर करोड़ों का मुआवजा ऐंठ लिया।
  •  अवध सिन्हा: नियमतः 4 गुना राशि मिलनी थी, लेकिन 1 एकड़ 35 डिसमिल के एवज में सिर्फ 32 लाख दिए गए। पटवारी ने अफसरों के साथ मिलकर फर्जीवाड़ा किया और मूल पंचनामा रिपोर्ट आज तक नहीं दिखाई गई।
सिस्टम और अफसरशाही के मौन पर उठते 4 चुभते सवाल

इस पूरे 'लैंड स्कैम' में प्रशासनिक अमले की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं:

 1. जब परियोजना के तहत जमीनों की खरीद-बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध था, तो रजिस्ट्रियां कैसे और किसके आदेश पर बेरोकटोक होती रहीं?

 2. मुआवजे की मलाई खाने के लिए जमीनों को छोटे टुकड़ों में बांटने (लैंड पूलिंग) की वैधानिक अनुमति देने वाला अधिकारी कौन था?

 3. कलेक्टर और एसडीएम की बैठकों में किए गए लिखित-मौखिक वादे के बावजूद, असली किसानों को 4 गुना मुआवजा और ब्याज अब तक क्यों नहीं दिया गया?

 4. क्या राजनांदगांव से लेकर जिला मुख्यालय तक बैठे आला अधिकारियों ने इस खुले भ्रष्टाचार से जानबूझकर अपनी आंखें मूंद रखी थीं?

प्रशासन का वही जवाब 

मामले को लेकर प्रशासन का फिर वही जवाब आया है की पूरा मामला हमारे संज्ञान में है और हम मामले की जांच कर रहे हैं ।  किसान और एनएचएआई (NHAI) की सुनवाई न्यायालय में चल रही है। माननीय न्यायालय के जो भी निर्देश होंगे, उनका अक्षरशः पालन किया जाएगा।

सत्यनारायण राठौर, संभाग आयुक्त, दुर्ग