
बिलासपुर. शहर के उप पंजीयक कार्यालय में इन दिनों नियमों की किताब व्यक्ति विशेष को देखकर खोली और बंद की जा रही है। पंजीयक प्रतीक खेमका के कार्यकाल में एक और कारनामा 10 जुलाई 2026 को खमतराई स्थित आदिवासी भूमि की रजिस्ट्री के दौरान देखने को मिला। यहां दो प्लाटों को मध्य प्रदेश के एक आदिवासी परिवार को बेचा गया। इस प्रक्रिया में मध्य प्रदेश का ही आदिवासी जाति प्रमाण पत्र लगा दिया गया।
दिलचस्प बात यह है कि इस काम को 'ननकी' नामक व्यक्ति के माध्यम से पूरा कराया गया। ननकी न तो अधिकृत स्टांप वेंडर है और न ही विभाग का मान्यता प्राप्त दस्तावेज लेखक। इसके बावजूद उप पंजीयक कार्यालय में उसकी धमक इतनी है कि उसके नाम पर किसी भी जमीन का पंजीयन आसानी से हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे विभाग ने ननकी को अघोषित रूप से अपना 'विशेष कार्यकारी अधिकारी' मान लिया है।
दोगलेपन की स्थिति तब सामने आई, जब उसी जमीन के एक अन्य टुकड़े को 13 तारीख को किसी अधिकृत दस्तावेज लेखक ने रजिस्ट्री के लिए प्रस्तुत किया। जाति प्रमाण पत्र साथ होने के बावजूद, उसे नियम-कायदों का पाठ पढ़ाकर बैरंग लौटा दिया गया।
ऐसी मनमानियां पहले भी आ चुकी हैं सामने
पंजीयक खेमका के दफ्तर में यह कोई नई बात नहीं है। पिछले कुछ महीनों के दौरान बिलासपुर पंजीयन कार्यालय में ऐसी गड़बड़ियों का लंबा सिलसिला चल रहा है। शासन का निर्देश है कि पांच डिसमिल से कम कृषि भूमि का पंजीयन नहीं किया जाएगा। इसके उलट, यहां धड़ल्ले से पांच डिसमिल से छोटी कृषि भूमियों की रजिस्ट्री हो रही है। यही नहीं, जिन डायवर्सन शुदा जमीनों पर रोक है, उन्हें भी बिना सक्षम अनुमति के छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर कच्ची प्लाटिंग का खेल चल रहा है। राजस्व को दरकिनार करते हुए इस तरह के कई दस्तावेजों का पंजीयन बीते छह माह में हुआ है, जिनकी सघन जांच हो तो बड़ा नुकसान उजागर हो सकता है।
हाल ही में पैसों के लेनदेन का एक और मामला चर्चा का विषय बना था। 3 जुलाई 2026 को एक प्रार्थी के दस्तावेज महज नाम की विसंगति बताकर लौटा दिए गए थे। आधार कार्ड में 'नरसिम्हन मूर्ति', एक कागज में 'ए. मुर्ति' और एक अन्य रिकॉर्ड में 'ए. नरसिम्हन मूर्ति' दर्ज था। इसी का हवाला देकर काम रोक दिया गया। लेकिन 9 जुलाई 2026 को जब वही खारिज दस्तावेज दूसरे व्यक्ति के माध्यम से पेश हुए, तो 25 हजार रुपये के लेनदेन के बाद बिना किसी आपत्ति के पंजीयन पूरा कर लिया गया।
विभागीय सूत्रों की मानें तो इस पूरी व्यवस्था को सुरक्षित रूप से चलाने के लिए विनोद श्रीवास जैसे बाहरी व्यक्तियों का सहारा लिया जा रहा है। विनोद विभाग का कर्मचारी नहीं है, बल्कि उसे बाहर से सेटिंग करने और रकम इकट्ठा करने के लिए रखा गया है। विभाग में ऐसे दो अन्य बाहरी लोग भी सक्रिय हैं, ताकि किसी भी सरकारी अधिकारी पर कोई आंच न आए।
पंजीयक खेमका के लिए लापरवाही का यह पहला मामला नहीं है। सक्ती जिले में अपनी पदस्थापना के दौरान उन्होंने एक आदिवासी व्यक्ति की भूमि बिना कलेक्टर की अनुमति के गैर आदिवासी के नाम दर्ज कर दी थी। इस शिकायत पर जांच के बाद संभागायुक्त ने उन्हें निलंबित किया था और भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न करने की चेतावनी दी थी। लगता है बिलासपुर आते-आते वह पुरानी चेतावनी फाइलों के ढेर में कहीं गुम हो गई है।