
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है । भूमि सीमांकन के लिए आठ महीने तक भटकने को मजबूर एक ग्रामीण की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि नामांतरण, सीमांकन और नक्शा सुधार जैसे छोटे-छोटे राजस्व मामलों के लिए आम नागरिकों का हाई कोर्ट तक पहुंचना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है । ऐसे मामलों का समाधान स्थानीय स्तर पर ही होना चाहिए । जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ ने तहसीलदार, बिलासपुर को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता की भूमि का सीमांकन 60 दिनों के भीतर कराया जाए ।
8 महीने तक नहीं हुआ सीमांकन
मामला बिलासपुर जिले के ग्राम परसदा का है । याचिकाकर्ता संदीप अग्रवाल ने 8 दिसंबर 2025 को पटवारी हल्का नंबर 49, राजस्व निरीक्षक मंडल सिरगिट्ठी, तहसील एवं जिला बिलासपुर में स्थित अपनी भूमि के सीमांकन के लिए आवेदन दिया था । उन्होंने खसरा नंबर 388/2 (1.1420 हेक्टेयर) और खसरा नंबर 390/3 (0.1940 हेक्टेयर) की भूमि का सीमांकन कराने का अनुरोध किया था । आरोप है कि आवेदन देने के बावजूद राजस्व अधिकारियों ने महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं की और सीमांकन की प्रक्रिया लंबित रखी ।
परेशान होकर हाई कोर्ट पहुंचा याचिकाकर्ता
राजस्व अधिकारियों की निष्क्रियता से परेशान होकर संदीप अग्रवाल ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से बिलासपुर हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की । सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से पेश पैनल वकील ने अदालत को बताया कि बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद बिना किसी अनावश्यक देरी के सीमांकन करा दिया जाएगा । इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए अदालत ने याचिका का निराकरण किया, लेकिन साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया कि आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर सीमांकन की पूरी प्रक्रिया पूरी की जाए ।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने राजस्व विभाग की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों को नक्शा सुधार, नामांतरण और सीमांकन जैसे सामान्य राजस्व कार्यों के लिए भी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, जो प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है । कोर्ट ने कहा कि यदि स्थानीय स्तर पर राजस्व अधिकारी समय पर अपने दायित्वों का निर्वहन करें, तो लोगों को न्याय के लिए अदालत की शरण लेने की नौबत ही नहीं आएगी l
बढ़ रहे हैं जमीन संबंधित मामले
बिलासपुर हाई कोर्ट में हाल के वर्षों में नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और नक्शा सुधार जैसे मामलों से जुड़ी याचिकाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है । इस फैसले को राजस्व विभाग के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि आम लोगों के छोटे-छोटे मामलों का समयबद्ध निराकरण सुनिश्चित किया जाए, ताकि उन्हें अनावश्यक रूप से अदालत का रुख न करना पड़े ।