
अंबिकापुर। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर आकार ले रहे कन्हार अंतर्राज्यीय सिंचाई बांध के प्रभावितों के हक के पैसों में बड़ी हेराफेरी का मामला सामने आया है। हसदेव गंगा कछार अंबिकापुर के मुख्य अभियंता ने इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा किया है साथ ही जल संसाधन विभाग के प्रमुख अभियंता को पत्र भेजकर जिम्मेदारों पर विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की है। पत्र में इस बात का जिक्र है कि यूपी सरकार से मुआवजे और विस्थापन के लिए प्राप्त राशी 70.34 करोड़ में से 18 करोड़ से अधिक की रकम नियमों को दरकिनार कर मनमाने कार्यों में खर्च कर दी गई।
सोनभद्र जिले के अमरवाड़ में स्थित इस कन्हार बांध परियोजना का इतिहास दशकों पुराना है। साल 1973 में जब केंद्रीय जल आयोग ने इसे पहली प्रशासकीय स्वीकृति दी थी, तब लागत 17 करोड़ रुपये थी। आज यह बजट बढ़कर 2257.13 करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। 3300.75 मीटर लंबे और 39.90 मीटर ऊंचे इस बांध की सिंचाई क्षमता 35,463 हेक्टेयर है। इसके डूब क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के भी छह गांव शामिल हैं। इनमें त्रिशूली, झूरा, कुशफर, सेमरवा, कामेश्वरनगर और पौली शामिल हैं। इस परियोजना में इन गांवों के सैकड़ो लोगों की भूमि प्रभावित हो रही हैं और उन्हें घर-बार छोड़ना पड़ रहा है।
इन्हीं प्रभावित ग्रामीणों के पुनर्वास पैकेज के लिए बैकुंठपुर जल संसाधन संभाग के कार्यपालन अभियंता ने साल 2016 में फंड का मांग पत्र भेजा था। इसके बाद यूपी के पिपरी खण्ड (कन्हार निर्माण खण्ड-तृतीय) के अधिशासी अभियंता ने अलग-अलग किस्तों में 70.34 करोड़ रुपये जारी किए। रिकॉर्ड के अनुसार 2015 में 40 लाख, 150 लाख व 50 लाख रुपये किस्तों में प्राप्त हुए थेl इसके बाद 2017 में तीन किस्तों में 30 करोड़, 30 करोड़ और 7.943 करोड़ रुपये बैकुंठपुर संभाग के जमा कराये गए ।
दस्तावेजों में शर्त थी कि डिपॉजिट राशी का यह पूरा फंड सिर्फ कन्हार के प्रभावित परिवारों के विस्थापन और उनकी जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया पर ही खर्च होगा। लेकिन कुर्सी पर बैठे तत्कालीन अफसरों ने सक्षम अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेना मुनासिब नहीं समझा। कार्यालयीन रिकॉर्ड की जांच में परत खुली है कि कुल 70.34 करोड़ में से महज 25.41 करोड़ रुपये ही पूर्व निर्धारित कार्यों में लगाए गए। बाकी करीब 18.10 करोड़ रुपये बिना किसी मंजूरी के गैर-प्रयोजन मद में खर्च कर दिए गए, जो विभागीय नियमों के विरुद्ध है।
सरकारी खजाने के इस दुरुपयोग में कई चेहरों की मिलीभगत उजागर हुई है। इनमें तत्कालीन कार्यपालन अभियंता यू.एस. राम, सेवानिवृत्त हो चुके वी.एस. साहू और प्रभारी ईई एस.के. दुबे का नाम शामिल है। इनके अलावा संभागीय लेखाधिकारियों की भी भूमिका रही, जिनमें धरमेन्द्र सिंह, राजू नगड्वार, कमलेश सिंह, विकास कुमार विसाल, संजीव कुमार तिवारी और रिटायर्ड वरिष्ठ लेखा लिपिक ए.के. मित्रा के नाम रिपोर्ट में दर्ज हैं।
मुख्य अभियंता ने 11 मार्च 2026 को भेजे अपने पत्र में लिखा है कि डिपॉजिट मद के पैसों को मनमाने तरीके से खर्च करने में प्रथम दृष्टया इनकी संलिप्तता पाई गई है। इसलिए जो अफसर अभी नौकरी में हैं, उन पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत एक्शन लिया जाए। वहीं जो रिटायर हो चुके हैं, उन पर सिविल सेवा पेंशन नियम 1976 के प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई हो। इस पत्र की प्रति रामानुजगंज व बैकुंठपुर के कार्यपालन अभियंता और अंबिकापुर श्याम बरनई परियोजना मंडल के अधीक्षण अभियंता को भी आवश्यक कार्यवाई हेतु भेजी गई है।