
Nepal Flood Loss And Damage: हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के सामने सिर्फ राहत और बचाव का संकट नहीं खड़ा किया है, बल्कि अब क्लाइमेट जस्टिस और ‘लॉस एंड डैमेज’ का मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है। 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ के बाद नेपाल में जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। ग्लेशियर और बर्फ-पत्थर के बड़े पैमाने पर खिसकने से आई इस आपदा ने सड़क, पुल, बस्तियों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है।
नेपाल सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित इलाकों में राहत पहुंचाने के साथ-साथ तबाह हुए बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना है। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले के मुताबिक, आपदा के बाद देश को करीब 4 से 5 अरब डॉलर तक की पुनर्बहाली और पुनर्निर्माण लागत का सामना करना पड़ सकता है। यह राशि नेपाल की अर्थव्यवस्था के करीब 10 फीसदी के बराबर बताई गई है।
राहत से आगे बढ़कर ‘क्लाइमेट जस्टिस’ की मांग
नेपाल लंबे समय से यह मुद्दा उठाता रहा है कि जलवायु परिवर्तन में उसका योगदान बेहद कम है, जबकि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों में बदलाव का असर उसे गंभीर रूप से झेलना पड़ रहा है। मौजूदा आपदा ने इस बहस को और तेज कर दिया है। सवाल अब सिर्फ तत्काल राहत का नहीं है, बल्कि यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले लॉस एंड डैमेज का आर्थिक बोझ आखिर कौन उठाएगा।
नेपाल जैसे पर्वतीय और कम-उत्सर्जन वाले देशों के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लेशियरों के पिघलने और ग्लेशियल झीलों के बढ़ते खतरे से भविष्य में अचानक बाढ़ की घटनाएं और गंभीर हो सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने भी हिमालय में ग्लेशियल बाढ़ के बढ़ते जोखिम को लेकर चेतावनी दी है।
चीन सीमा से शुरू हुई तबाही, तिब्बत भी प्रभावित
26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के खिसकने के बाद पानी और मलबे का विशाल प्रवाह भोटेकोशी नदी में पहुंचा। इसके बाद बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों को प्रभावित किया और आगे त्रिशूली नदी तंत्र तक इसका असर पहुंचा। तिब्बत में भी इसी आपदा का असर देखने को मिला। ताजा रिपोर्टों के अनुसार वहां 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी है। चीन ने प्रभावित क्षेत्र तक पहुंच बहाल करने के लिए सड़क मार्ग भी दोबारा खोल दिया है, जिससे भारी मशीनरी और राहत सामग्री पहुंचाने में मदद मिल रही है।
नेपाल के सामने अब 5 अरब डॉलर तक की पुनर्निर्माण चुनौती
आपदा के बाद नुकसान का आकलन लगातार जारी है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, नेपाल को पुनर्निर्माण और आर्थिक गतिविधियों को सामान्य स्थिति में लाने के लिए 4 से 5 अरब डॉलर की जरूरत पड़ सकती है। बाढ़ ने हाइड्रोपावर क्षेत्र को भी बड़ा झटका दिया है। कई परियोजनाएं और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे क्षतिग्रस्त हुए हैं। ऐसे में पुनर्निर्माण सिर्फ सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास पर भी भारी खर्च करना होगा।
भारत की भूमिका भी अहम, सीमा पार बढ़ी चुनौती
नेपाल की इस आपदा का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिमालयी नदियों का जल प्रवाह आगे भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचता है। ऐसे में नेपाल में ग्लेशियर से जुड़ी अचानक आने वाली बाढ़ सिर्फ एक देश की समस्या नहीं रह जाती। भारत और नेपाल के बीच आपदा प्रबंधन, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, नदी निगरानी और सीमा-पार राहत समन्वय आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भारत लंबे समय से जलवायु वार्ताओं में ऐतिहासिक उत्सर्जन और विकसित देशों की जिम्मेदारी का मुद्दा उठाता रहा है। वहीं नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि जलवायु परिवर्तन के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले देशों को आर्थिक और तकनीकी मदद किस तरह उपलब्ध कराई जाए।
हिमालय का संकट सिर्फ नेपाल का नहीं
विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तापमान ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों के जोखिम को बढ़ा रहा है। नेपाल, चीन और भारत के पर्वतीय इलाकों में मौजूद संवेदनशील ग्लेशियर और झीलें भविष्य में अचानक बाढ़ का कारण बन सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने भी चेताया है कि हिमालय में ग्लेशियल बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है और मौजूदा आपदा इस खतरे की गंभीरता को दिखाती है। इसलिए नेपाल की मौजूदा त्रासदी को सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, क्षेत्रीय सहयोग और विकास की टिकाऊ नीति से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है।
नेपाल की तबाही ने दुनिया के सामने खड़ा किया बड़ा सवाल
एक तरफ नेपाल को अरबों डॉलर के पुनर्निर्माण की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ हिमालय में बढ़ते जलवायु जोखिम पर वैश्विक कार्रवाई की मांग तेज हो रही है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि बाढ़ से कितना नुकसान हुआ, सवाल यह भी है कि बढ़ते जलवायु जोखिम की कीमत कौन चुकाएगा और हिमालय को अगली ऐसी तबाही से कैसे बचाया जाएगा?