जीपीएम : स्वास्थ्य सेवा के नाम पर मरीजों की जिंदगी को खतरे में डालने वाले निजी अस्पताल के खिलाफ जिला प्रशासन ने बड़ी और निर्णायक कार्रवाई की है। गौरेला के डी.डी. हॉस्पिटल (सेमरा तिराहा) में सामने आई गंभीर लापरवाही, नियमों की खुलेआम अनदेखी और इलाज व्यवस्था में भारी खामियों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रशासनिक जांच में ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने न केवल मरीजों की सुरक्षा पर चिंता बढ़ा दी, बल्कि अस्पताल की कार्यप्रणाली की भी पोल खोल दी। जांच रिपोर्ट के आधार पर कलेक्टर एवं पर्यवेक्षी प्राधिकारी ने अस्पताल का पंजीयन (लाइसेंस) तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है, जबकि ऑपरेशन थिएटर (ओटी) और आईसीयू वार्ड को सील कर दिया गया है।

जांच के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि अस्पताल में गंभीर और ऑपरेशन के बाद भर्ती मरीज इलाजरत थे, लेकिन उनकी निगरानी और उपचार के लिए न तो कोई चिकित्सक मौजूद था और न ही कोई प्रशिक्षित (क्वालिफाइड) नर्सिंग स्टाफ। यानी जिन मरीजों को चौबीसों घंटे विशेषज्ञ चिकित्सा देखरेख की आवश्यकता थी, उन्हें बिना चिकित्सकीय निगरानी के भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। प्रशासन ने इसे मरीजों के जीवन के साथ गंभीर खिलवाड़ मानते हुए कड़ी कार्रवाई की है और संकेत दिए हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले किसी भी संस्थान को बख्शा नहीं जाएगा।

प्रसूता की मौत और परिजनों के हंगामे से खुला राज  

मामले का खुलासा एक प्रसूता की मौत के बाद हुए हंगामे से हुआ। बेदरचुआ (पेण्ड्रा) निवासी ज्योति सोनवानी की तबीयत गंभीर होने पर उन्हें जिला अस्पताल से बेहतर इलाज के लिए सिम्स बिलासपुर रेफर किया गया था। आरोप है कि रास्ते में एम्बुलेंस को कथित दलालों और एजेंटों ने रोककर परिजनों को गुमराह किया तथा मरीज को सिम्स ले जाने के बजाय वापस डी.डी. हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया।

बताया गया कि अस्पताल में आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ चिकित्सकों के अभाव के बावजूद 11 जून से 16 जून 2026  तक मरीज का इलाज किया जाता रहा। इस दौरान परिजनों से इलाज के नाम पर करीब 1.45 लाख से 1.50 लाख रुपये की राशि भी वसूली गई। हालत लगातार बिगड़ने के बाद आखिरकार मरीज को सिम्स बिलासपुर रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई।

मरीज की मौत के बाद परिजनों का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने शव को डी.डी. हॉस्पिटल के सामने रखकर चक्काजाम कर दिया और अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही तथा अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगाए। घटना के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ और अस्पताल के जांच के आदेश दिए गए।

जांच में 5 बड़े खुलासे

एसडीएम के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम (जिसमें नोडल अधिकारी डॉ. भरत भूषण त्रिपाठी, बीएमओ डॉ. सतीश कुमार अर्गल सहित अन्य अधिकारी शामिल थे) और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) के दोहरे निरीक्षण में ये हैरान करने वाले तथ्य सामने आए।

लाइलाज बीमारी पर भी चला ऑपरेशन का चाकू

मृतक मरीज 'एक्लैम्प्सिया (Eclampsia)' जैसी अत्यंत गंभीर और जानलेवा चिकित्सीय स्थिति से पीड़ित थी। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी का उपचार केवल मेडिकल कॉलेज, सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल या उच्च स्तरीय विशेषज्ञ स्वास्थ्य संस्थानों में ही सुरक्षित रूप से संभव है।

इसके बावजूद मरीज को बेहतर उपचार के लिए रेफर करने के बजाय डी.डी. हॉस्पिटल में भर्ती कर लिया गया। जांच में सामने आया कि अस्पताल में न तो स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) उपलब्ध थीं और न ही निश्चेतना विशेषज्ञ (एनेस्थेटिस्ट)। इन आवश्यक विशेषज्ञों और संसाधनों के अभाव के बावजूद मरीज का ऑपरेशन कर दिया गया,

आईसीयू और ओटी में नहीं कोई विशेषज्ञ

निरीक्षण के दौरान अस्पताल में 11 मरीज भर्ती पाए गए, जिनमें से 3 मरीजों का हाल ही में ऑपरेशन हुआ था। लेकिन पूरी संस्था में एक भी डॉक्टर या प्रशिक्षित नर्स मौजूद नहीं थी। मरीज भगवान भरोसे पड़े थे।

दो गर्भवती की हो गई मौत 

एक और मामला सामने आया हैं जहाँ ग्राम जिल्दा निवासी लीलावती (35 वर्ष) को 5 जून 2026 को अत्यंत गंभीर स्थिति (गंभीर एकलैंप्सिया व एनीमिया) में भर्ती कर ऑपरेशन किया गया था। बाद में 20 जून को जिला अस्पताल में उसकी भी मृत्यु हो गई। यानी इलाज के अभाव में अस्पताल की लापरवाही से 02 मरीजों की मौत दर्ज की गई।

आयुष्मान भारत के नाम पर लूट

अस्पताल प्रबंधन आयुष्मान भारत योजना के तहत भर्ती मरीजों से इलाज के नाम पर अतिरिक्त अवैध शुल्क वसूल रहा था । ज्योति सोनवानी के इलाज के नाम पर 1.45 लाख का मनमाना बिल थमाया गया, जिसे जांच टीम ने पूरी तरह से अवैध पाया।

नियमों की उडी धज्जियां

'छत्तीसगढ़ राज्य उपचर्यागृह तथा रोगोपचार संबंधी स्थापनाएं अनुज्ञापन अधिनियम, 2010' के प्रावधानों के अनुसार किसी भी पंजीकृत निजी अस्पताल में 24 घंटे योग्य चिकित्सक की उपलब्धता अनिवार्य है। हालांकि, डी.डी. हॉस्पिटल प्रबंधन ने अपने जवाब में अस्पताल में चिकित्सकों की नियमित उपलब्धता का दावा किया, लेकिन प्रशासनिक जांच में यह दावा पूरी तरह खोखला साबित हुआ।

जांच दल ने 17 और 18 जून को लगातार दो दिनों तक अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। इस दौरान अस्पताल में एक भी डॉक्टर ड्यूटी पर मौजूद नहीं मिला। जबकि उसी समय अस्पताल में गंभीर मरीज भर्ती थे और आईसीयू सहित अन्य वार्ड संचालित हो रहे थे। जांच टीम ने इसे अधिनियम के प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया, जिसके आधार पर प्रशासन ने अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की।

कलेक्टर की सख्ती

अस्पताल संचालक द्वारा कारण बताओ नोटिस का दिया गया जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया। तत्कालीन कलेक्टर एवं पर्यवेक्षी प्राधिकारी संतोष देवांगन ने नर्सिंग होम एक्ट की धारा 12 (क एवं ख) के तहत कार्रवाई करते हुए डी.डी. अस्पताल का पंजीयन तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है। अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू वार्ड को पूरी तरह सील कर दिया गया है।