
रायपुर। राजधानी के सरकारी स्कूलों में कभी लंच की घंटी बजते ही खेल मैदान बच्चों की कबड्डी, दौड़ और फुटबॉल के शोर से गूंज उठते थे। लेकिन अब इन मैदानों की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। बारिश के मौसम में कीचड़ से बचाव के लिए स्कूल प्रबंधनों ने जो तरीका अपनाया है, वह बच्चों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। खेल मैदानों से मुलायम मिट्टी गायब हो चुकी है और उसकी जगह नुकीली बजरी, गिट्टी तथा काली राखड़ ने ले ली है। इस कारण बच्चों का खेलना लगभग बंद हो गया है।
थोड़ी सी भी भाग-दौड़ करने पर बच्चे गिर रहे हैं, जिससे उनके घुटने, हथेलियां और कोहनियां छिल रही हैं। इसके साथ ही टखना मुड़ने और हड्डियों में फ्रैक्चर का खतरा भी बना रहता है। चोट लगने के इसी डर से अब छात्र-छात्राएं लंच या गेम्स पीरियड में ग्राउंड की तरफ जाने से कतराते हैं। खेल शिक्षक भी बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नियमित प्रैक्टिस कराने में झिझक रहे हैं।
खेल का शानदार इतिहास, पर वर्तमान बदहाल
सबसे ज्यादा खराब स्थिति उन स्कूलों की है, जिन्होंने खेलों में अपनी अलग पहचान बनाई है। मोवा स्थित सरकारी स्कूल इसका बड़ा उदाहरण है। इस स्कूल की मिट्टी से निकलकर 250 से ज्यादा खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर और एक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का नाम रोशन किया है। आज इसी स्कूल का ग्राउंड बजरी से भरा पड़ा है। बच्चों का कहना है कि बजरी पर खेलना काफी जोखिम भरा है। इसके चलते यहां अब शाम का अभ्यास और नियमित खेल गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई हैं।
मलबे और राखड़ ने बर्बाद किया ग्राउंड
भनपुरी के प्राथमिक स्कूल के मैदान में कभी बच्चे मिट्टी पर खेलते थे। कुछ माह पहले स्कूल परिसर के पुराने भवन को तोड़ा गया। उस भवन का मलबा बाहर फेंकने के बजाय मैदान में ही बिछा दिया गया और उसे छिपाने के लिए ऊपर से काली राखड़ डाल दी गई। अब यह मैदान किसी भी खेल के लायक नहीं बचा है। बीरगांव के आडवाणी स्कूल के मैदान का बड़ा हिस्सा और वॉलीबॉल कोर्ट भी राखड़ से पटा हुआ मिला।
पथरीले मैदान पर प्रार्थना करने की मजबूरी
बूढ़ापारा के जेआर दानी स्कूल में हालात और भी खराब हैं। यहां बच्चे इसी बजरी वाले मैदान पर अपनी सुबह की प्रार्थना करते हैं और खाली समय भी यहीं बिताते हैं। मैदान के किनारे अभी भी बजरी के ढेर लगे हुए हैं, जो बताते हैं कि मैदान को पथरीला करने का काम अभी भी चल रहा है।
अधिकारियों और विशेषज्ञों की राय
खेल विशेषज्ञ एससी वर्मा मानते हैं कि मिट्टी में गिरने पर चोट का असर कम होता है। बजरी पर गिरने से त्वचा गहराई तक छिल जाती है। बच्चे को चोट लगने पर अभिभावक दोबारा मैदान भेजने से डरते हैं। प्राचार्यों को सुरक्षित मैदान विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि प्रतिभाएं बिना किसी डर के अभ्यास कर सकें।
वहीं, स्कूल शिक्षा विभाग के असिस्टेंट डायरेक्टर (स्पोर्ट्स) संजय शुक्ला का कहना है कि मैदान तैयार करने के लिए राखड़ और बजरी का उपयोग खिलाड़ियों की सुरक्षा के हिसाब से उचित नहीं है। सभी स्कूलों को पत्र भेजकर मैदानों की वर्तमान स्थिति की जानकारी मंगाई जाएगी। प्राचार्यों को अपने स्कूलों में खेल मैदान की गुणवत्ता और कमियों पर नियमित रूप से ध्यान देना चाहिए।