
अम्बिकापुर/रायपुर।कन्हर अंतर्राज्यीय सिंचाई परियोजना के डूब क्षेत्र से प्रभावित छत्तीसगढ़ के छह गांवों के विस्थापन और भूमि अधिग्रहण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 70.34 करोड़ रुपये भेजे थे। नियम साफ था—यह राशि सिर्फ संबंधित कार्यों में ही खर्च होगी। लेकिन दस्तावेजों से सामने आया कि करीब 18.10 करोड़ रुपये गैर-प्रयोजन मद में उड़ा दिए गए। मुख्य अभियंता हसदेव गंगा कछार ने 11 मार्च 2026 को दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर दी। फिर भी फाइल प्रमुख अभियंता कार्यालय में अटकी पड़ी है। सवाल उठ रहा है—कौन है वो खुसंठ अधिकारी जो इस फाइल को दबाने पर आमादा है?
मुख्य अभियंता के पत्र में साफ लिखा है कि उत्तर प्रदेश से आई राशि का उपयोग केवल कन्हर सिंचाई परियोजना से जुड़े कामों में होना था। तात्कालिक अधिकारियों ने सक्षम अधिकारी की मंजूरी के बिना पद का दुरुपयोग करते हुए निर्धारित कार्यों से इतर खर्च कर दिया। प्राप्त 70.34 करोड़ में से केवल 25.41 करोड़ ही सही मद में लगे, जबकि 18.10 करोड़ गैर-प्रयोजन में चले गए। इसमें परोक्ष संलिप्तता पाई गई है—सेवानिवृत्त कार्यपालन अभियंता यू.एस. राम, वी.एस. साहू, प्रभारी एस.के. दुबे के साथ संभागीय लेखाधिकारी धर्मेन्द्र सिंह, राजू नगडूवार, कमलेश सिंह, विकास कुमार विसाल, संजीव कुमार तिवारी और वरिष्ठ लेखा लिपिक ए.के. मित्रा की।
मुख्य अभियंता ने वर्तमान दोषी अधिकारियों पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 और सेवानिवृत्त अधिकारियों पर पेंशन नियम 1976 के तहत कार्रवाई की अनुशंसा की। पत्र प्रमुख अभियंता, जल संसाधन विभाग, शिवनाथ भवन, रायपुर को भेजा गया। प्रतिलिपियां अधीक्षण अभियंता श्याम बरनई परियोजना मंडल और कार्यपालन अभियंता बैकुण्ठपुर को भी दी गईं। लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय तक यह फाइल पहुंचने से पहले ही रुक गई।
अब सवाल यह है कि प्रमुख अभियंता कार्यालय में बैठे किस खुर्राट अधिकारी ने मुख्य अभियंता की सिफारिश के बावजूद अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी? कौन है वो शख्स जो नहीं चाहता कि विभाग की गंदगी साफ हो और माननीय मुख्यमंत्री की साख पर कोई दाग लगे? जल संसाधन विभाग में उच्च पद पर बैठकर इन भ्रष्टाचारियों के काले कारनामों पर पर्दा डालने वाला अधिकारी कौन है? क्या कोई ऐसा है जो भ्रष्टाचारियों की फाइल मंत्रालय नहीं पहुंचाने के बदले प्रति व्यक्ति निश्चित रकम वसूल रहा है?
सचिव राजेश एस. कुमार टोप्पो नहीं चाहते कि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने वाले शातिर शख्स बेनकाब हों? या वे भी इस खेल में शामिल हैं? सूत्रों का कहना है कि फाइल जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाली गई है ताकि दोषियों को राहत मिल सके। कन्हर प्रोजेक्ट पहले से विवादास्पद रहा है। 1973 में 17 करोड़ की स्वीकृति वाली योजना आज 2257 करोड़ की लागत पर पहुंच चुकी है। छत्तीसगढ़ के त्रिशुली, कुमरा, कुशफर, सेमरवा, कामेश्वरनगर और घौली डुबान गांव प्रभावित हो रहे हैं। विस्थापित परिवारों के पैकेज के नाम पर आई राशि का दुरुपयोग होना गंभीर मामला है।
जनहित में यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री कार्यालय स्वयं इस फाइल को मंगवाए और स्वतंत्र जांच बैठाए। अगर उच्च अधिकारी खुद संरक्षण दे रहे हैं तो विभाग की विश्वसनीयता खतरे में है। जनता इंतजार कर रही है—क्या इस घोटाले पर पर्दा पड़ेगा या दोषियों पर कार्रवाई होगी?