रायपुर। छत्तीसगढ़ में सुशासन के दावों के बीच सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। बुधवार 29 अप्रैल को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में एक ऐसा फैसला लिया गया, जिसने ब्यूरोक्रेसी से लेकर सियासी गलियारों तक में नई बहस छेड़ दी है। सरकार ने 1988 बैच के तीन आईपीएस अधिकारियों संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता के 26 सितंबर 2019 को जारी डिमोशन (पदावनति) आदेश को रद्द कर दिया है।

लेकिन इस फैसले ने एक बड़ा विरोधाभास पैदा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार की प्राथमिकताएं आम जनता और पुलिस महकमे का नेतृत्व सुधारने से ज्यादा, विवादित और रिटायर्ड अफसरों को उपकृत करने की हैं?

 

रेगुलर DGP की नियुक्ति पर सन्नाटा, रिटायर्ड अफसरों की 'चिंता

 

वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवालिया निशान यही है कि प्रदेश लंबे समय से बिना एक नियमित (रेगुलर) पुलिस महानिदेशक (DGP) के चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में राज्य को फटकार भी लगा चुका है, लेकिन सरकार ने अब तक पुलिस महकमे के स्थायी मुखिया की नियुक्ति की जहमत नहीं उठाई। इसके उलट, सरकार की पूरी मशीनरी और कैबिनेट का कीमती समय उन अफसरों के डिमोशन को निरस्त करने में लग रहा है, जो सालों पहले रिटायर हो चुके हैं और जिनके खिलाफ पद पर रहते हुए गंभीर आपराधिक आरोप लग चुके हैं। आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या इसी का नाम सुशासन है?

 

असली लाभार्थी मुकेश गुप्ता: आरोपों के बावजूद मिला DGP का ओहदा

 

कैबिनेट के इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा पूर्व आईपीएस मुकेश गुप्ता को होने जा रहा है। संजय पिल्ले और आरके विज को तो पिछली सरकार ने बाद में फिर से प्रमोट कर दिया था, इस फैसले से केवल उनके दस्तावेजों (सर्विस रिकॉर्ड) से डिमोशन का दाग धुलेगा। लेकिन मुकेश गुप्ता के लिए यह फैसला संजीवनी है।

कांग्रेस सरकार के समय मुकेश गुप्ता सबसे ज्यादा विवादों में रहे थे। उन पर पीडीएस घोटाले में फर्जी दस्तावेज बनाने, सबूतों से छेड़छाड़ और अवैध फोन टैपिंग जैसे गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज हुई थी। हालात ये थे कि उन्हें राज्य से बाहर रहना पड़ा और अंततः वे तमाम मुकदमों के बीच एडीजी (ADG) के पद से ही रिटायर हुए। अब साय सरकार के इस मेहरबानी भरे फैसले से उन्हें न सिर्फ पूर्व DGP का ओहदा मिल जाएगा, बल्कि बैक-डेट से पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य वित्तीय लाभ भी मिलेंगे।

क्या था पूरा मामला?

रमन सिंह की पिछली सरकार ने 2018 के विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले इन तीनों अफसरों को ADG से DG प्रमोट कर दिया था। लेकिन भारत सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) से इस प्रमोशन को सहमति नहीं मिली। इसी आधार पर 2019 में तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने कैबिनेट में फैसला लेकर तीनों का डिमोशन कर दिया था। राज्य के इतिहास में यह पहला मौका था जब तीन सीनियर आईपीएस एक साथ डिमोट हुए थे।

 

सुशासन पर सवाल

बुधवार को कैबिनेट ने 2019 के उस फैसले को पलट तो दिया है, लेकिन इसने सरकार की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कानून-व्यवस्था की चुनौतियों से जूझ रहे राज्य को एक फुल-टाइम डीजीपी देने के बजाय, गंभीर आरोपों से घिरे एक रिटायर्ड अफसर की फाइलें क्लियर करना बताता है कि सिस्टम में 'पॉवर गेम' कैसे काम करता है। अब जनता और ब्यूरोक्रेसी के बीच यही चर्चा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी कर विवादित चेहरों की चिंता करना ही क्या इस सरकार का सुशासन मॉडल है?