रायपुर। 15 अगस्त को रायपुर नगर निगम मुख्यालय में शान से तिरंगा लहराया , लेकिन इसके साथ ही निगम की अंदरूनी राजनीति भी सबके सामने आ गई। स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के मंच से सभापति सूर्यकांत राठौड़ का दर्द ऐसा छलका कि उन्होंने अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बीच मचे घमासान की पूरी मंच से बयां कर दी। उन्होंने अपने भाषण में द कहा कि शहर का विकास में बाधा आ रही है और जिम्मेदार लोग अपना ईगो पालकर बैठे हैं। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि उन्हें भरे मंच से कहना पड़ा कि अब उनसे यह सब बर्दाश्त नहीं हो रहा है।

अपने पच्चीस साल के राजनीतिक कैरियर का जिक्र करते हुए राठौड़ ने निगम के मौजूदा हालात को अपने पूरे कार्यकाल में सबसे दुखद बताया । इससे पहले वो तीन बार कांग्रेस और दो बार भाजपा के दौर में पार्षद, एमआईसी मेंबर और नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी संभाल चुके हैं। उनके मुताबिक, राजधानी के निगम में ऐसी अराजकता पहले कभी नहीं रही। इन दिनों अफसरों और पार्षदों के बीच जो थानेबाजी चल रही है, उस पर भी उन्होंने चुटकी ली । छोटी-छोटी बातों पर जनप्रतिनिधियों के खिलाफ धड़ाधड़ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। उन्होंने मंच पर बैठे कमिश्नर संबित मिश्रा और महापौर मीनल चौबे की ओर इशारा करते हुए याद दिलाया कि ताली हमेशा दोनों हाथ से बजती है। हाथ छोटा हो या बड़ा, कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कोई मामला है तो उसे महापौर या कमिश्नर के स्तर पर आपस में बैठकर सुलझाया जा सकता है, इसके लिए पुलिस के पास दौड़ लगाने की क्या जरूरत आ पड़ी है।

पुराने दिनों को याद करते हुए सभापति ने एक किस्सा भी सुनाया। कांग्रेस के जमाने में एक बार वो किसी बैठक से नाराज होकर बीच में ही उठकर घर चले गए थे। अगले ही दिन सुबह जोन कमिश्नर का फोन आया और तत्कालीन निगम कमिश्नर खुद उनके घर चाय पीने पहुंच गए। अच्छे माहौल में बातचीत हुई और मान-मनौव्वल के बाद मामला वहीं रफा-दफा हो गया। लेकिन आज के दौर में ऐसा आपसी तालमेल और बड़प्पन ढूंढे नहीं मिलता। आज संवादहीनता के चलते हर कोई अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग अलाप रहा है। पुराने रिटायर्ड कर्मचारी आज भी निगम को अपना परिवार मानकर झंडारोहण में चले आते हैं, लेकिन मौजूदा सिस्टम में वह अपनत्व गायब हो चुका है।

सभापति सिर्फ आपसी खींचतान तक नहीं रुके, उन्होंने निगम की कार्यप्रणाली पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि जब कोई मकान बनना शुरू होता है, नक्शा पास किया जाता है, तब अफसर आंखें मूंद कर क्यों बैठे रहते हैं? उस समय मौके पर काम क्यों नहीं रोका जाता? दो-दो साल बाद अचानक नींद खुलती है और अवैध निर्माण बताकर उसे तोड़ने पहुंच जाते हैं। उस बिल्डिंग में लगी सीमेंट, छड़ और गिट्टी की बर्बादी को उन्होंने एक तरह से राष्ट्रीय क्षति बताया।

राजधानी का नगर निगम, जो पूरे प्रदेश के निकायों के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक मापदंड तय करने वाला माना जाता है, वह आज अपनी ही कार्यप्रणाली के चलते डराने वाला माहौल बना रहा है। इस दौरान मंच के नीचे बैठे एमआईसी मेंबर, नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी और नवनियुक्त एल्डरमैन भी इस पूरी खरी-खरी को चुपचाप सुनते रहे।