
बिलासपुर : रेलवे ट्रैक पार करते समय ट्रेन की चपेट में आकर जान गंवाने वाली महिला के परिवार को आखिरकार बीमा का हक मिल गया। बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि महिला अधिकृत क्रॉसिंग के बजाय रेलवे ट्रैक पार कर रही थी। लेकिन जिला उपभोक्ता आयोग ने इस तर्क को बीमा राशि रोकने के लिए पर्याप्त नहीं माना। आयोग ने द ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी को मृतका के पति को दो लाख रुपए की बीमा राशि, उस पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज, 25 हजार रुपए मानसिक क्षतिपूर्ति और पांच हजार रुपए वाद व्यय देने का आदेश दिया है। यानी बीमा राशि और निर्धारित क्षतिपूर्ति के रूप में कंपनी को कुल 2.30 लाख रुपए के साथ ब्याज भी चुकाना होगा।
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष आनंद कुमार सिंघल, सदस्य पूर्णिमा सिंह और आलोक कुमार पांडेय की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि केवल रेलवे ट्रैक पार करने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि मृतका ने जानबूझकर अपनी जान जोखिम में डाली थी। आयोग ने आदेश की प्रति मिलने के 45 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है।
खेत से लौटते समय ट्रेन की चपेट में आई महिला
मामला कोटा तहसील के ग्राम खुरदुर निवासी नोहर वैष्णव की पत्नी सुनीता वैष्णव की मौत से जुड़ा है। 11 अगस्त 2024 को नोहर अपनी पत्नी और बेटे के साथ खेत गए थे। धान का थरहा लेकर लौटते समय सुनीता बिलासपुर-कटनी रेल लाइन पार कर रही थी। इसी दौरान कलमीटार और करगीरोड के बीच भुज सुपरफास्ट एक्सप्रेस की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई। परिवार के लिए यह हादसा बड़ा सदमा था, लेकिन इसके बाद बीमा राशि पाने के लिए भी पति को कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
20 रुपए प्रीमियम कटने के बाद भी नहीं मिला बीमा
सुनीता के बैंक खाते से 27 मई 2024 को प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा बीमा योजना के नवीनीकरण के लिए 20 रुपए का प्रीमियम काटा गया था। पत्नी की दुर्घटना में मौत के बाद नोहर वैष्णव ने बीमा कंपनी के समक्ष दो लाख रुपए की बीमा राशि के लिए दावा प्रस्तुत किया। भुगतान नहीं मिलने पर उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और इसे सेवा में कमी बताते हुए परिवाद दायर किया।
आयोग में नहीं टिक सकी बीमा कंपनी की दलील
बीमा कंपनी ने दावा खारिज करने के पीछे तर्क दिया कि सुनीता अधिकृत रेलवे क्रॉसिंग से नहीं, बल्कि सीधे रेलवे ट्रैक पार कर रही थी। कंपनी के अनुसार, यह प्रतिबंधित और जोखिम भरा काम था। हालांकि आयोग ने पुलिस जांच, रेलवे से मिली सूचना और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया। रिकॉर्ड में मौत दुर्घटनावश होने की पुष्टि हुई, जबकि आत्महत्या या जानबूझकर अपनी जान जोखिम में डालने का कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं मिला। आयोग ने माना कि रेलवे ट्रैक पार करने की परिस्थिति मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि महिला ने जानबूझकर अपनी जान जोखिम में डाली थी। इसी आधार पर बीमा कंपनी द्वारा दावा खारिज करने को सेवा में कमी माना गया और बीमित राशि के साथ ब्याज, मानसिक क्षतिपूर्ति तथा वाद व्यय देने का आदेश सुनाया गया।