रायपुर। छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग (WRD) में नियमों को ताक पर रखकर रसूखदारों को उपकृत करने के एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं । जिस अफसर पर करीब 11 साल पहले (2015 में) एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने आय से अधिक संपत्ति का छापा मारा था, जिसके खिलाफ 2018 में चार्जशीट तैयार हो चुकी थी, उस पुराने और दागदार इतिहास को विभाग ने पूरी तरह से भुला दिया है। पुराने मामले की लीपापोती करते हुए अब इस जूनियर अफसर को सीधे चीफ इंजीनियर (CE) जैसी मलाईदार कुर्सी पर बैठा दिया गया है।

यह 'प्रभार का खेल' इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सिस्टम में अगर आपकी पैठ मजबूत है, तो आपके पुराने पाप न सिर्फ धुल जाते हैं, बल्कि आपको ईनाम भी मिलता है।

 

कब्र से निकला 11 साल पुराना जिन्न और विभाग की मेहरबानी

 

जिस अफसर सुरेश कुमार पाण्डेय पर विभाग ने यह असीम कृपा बरसाई है, उनका पुराना इतिहास विवादों का पुलिंदा है। 20 जुलाई 2015 को ACB रायपुर ने उनके भिलाई स्थित मकान पर छापा मारा था, जिसमें वैध आय से कई गुना अधिक बेहिसाब संपत्ति मिली थी।

ठोस सबूतों के आधार पर 2017 में विधि विभाग ने उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दी और 2018 में एक मजबूत चार्जशीट भी बन गई। लेकिन, आरोपी अफसर ने रसूख का इस्तेमाल कर तत्कालीन मुख्यमंत्री से 'पुनः जांच' का आदेश करवा लिया और मामले को ठंडे बस्ते में डलवा दिया। अब करीब एक दशक बाद, जब हाईकोर्ट ने हाल ही में 'पुनः जांच' पूरी किए बिना पुरानी चार्जशीट पेश करने की 'तकनीकी खामी' पर सवाल उठाया, तो विभाग ने इस प्रक्रियात्मक राहत को अफसर की 'क्लीन चिट' मान लिया और उन्हें सिर-आंखों पर बिठा लिया।

 

मई 2026 का ताज़ा खेल: 'वैकल्पिक व्यवस्था' की आड़ में मनमानी

 

महानदी-गोदावरी कछार, रायपुर के चीफ इंजीनियर सतीश कुमार टीकम के 30 अप्रैल को रिटायर होने के बाद, इस कुर्सी पर सबसे सीनियर अधीक्षण अभियंता (SE) सिल्वेस्टर मिंज का हक बनता था। मिंज ने हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए प्रभार भी मांगा, क्योंकि कोर्ट ने नई पोस्टिंग पर रोक लगा रखी है।

लेकिन, पुराने दागी अफसर को सेट करने के लिए विभाग ने 8 मई 2026 को एक गजब का रास्ता निकाला। एक नया आदेश (क्रमांक 3317003) जारी कर दुर्ग (शिवनाथ मंडल) में पदस्थ जूनियर एसई सुरेश पाण्डेय को इस मलाईदार कुर्सी का 'अतिरिक्त प्रभार' सौंप दिया। अदालत की अवमानना से बचने के लिए इसे 'आंतरिक/वैकल्पिक व्यवस्था' का नाम दिया गया।

 

न्यायालयीन प्रक्रिया का खुला मजाक 

 

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा पेंच यह है कि सुरेश पाण्डेय खुद उस पदोन्नति/पोस्टिंग विवाद में हाईकोर्ट में एक पक्षकार (पार्टी) हैं, जिस पर सुनवाई चल रही है। ऐसे में न्यायालयीन प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल, जूनियर और 11 साल पुराने ACB के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति को इतना अहम प्रभार सौंपना, विभाग की पारदर्शिता की पोल खोलता है।

 

सीनियर एसई की गुहार बेअसर, रसूख की जीत

 

सीनियर एसई सिल्वेस्टर मिंज ने न्याय के लिए मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव तक का दरवाजा खटखटाया, लेकिन सिस्टम की इस जादूगरी के आगे उनके सारे दावे धरे रह गए।

जल संसाधन विभाग की यह कार्यप्रणाली एक बड़ा सवाल खड़ा करती है: क्या विभाग में अब योग्यता और वरिष्ठता का कोई मोल नहीं बचा? आय से अधिक संपत्ति के इतने पुराने और संगीन मामले को दबाकर, दागदार अफसर को विभाग का मुखिया बना देना यह साबित करता है कि मंत्रालय में बैठे रणनीतिकार अपने चहेतों के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।