
नगर निगम की बड़ी लापरवाही: आईआईटी खड़गपुर की रिपोर्ट और जगहें तय होने के बाद भी धूल फांक रही योजना
रायपुर। राजधानी रायपुर में बढ़ते वायु प्रदूषण को रोकने के लिए तैयार किया गया 1.50 करोड़ रुपए का 'वाटर फाउंटेन' (फव्वारा) प्रोजेक्ट नगर निगम की लापरवाही के चलते फाइलों में ही दम तोड़ चुका है। 15वें वित्त आयोग के 'पर्यावरण एवं एयर क्वालिटी ग्रांट फंड' के तहत शहर के 20 अलग-अलग स्थानों पर पानी की फुहारों से धूल (PM10) को नीचे बैठाने की योजना थी। लेकिन चौंकाने वाला बात यह है कि बैठकों और टेंडर प्रक्रिया की सुस्ती में इस फंड के इस्तेमाल की अंतिम समयसीमा (31 मार्च 2026) खत्म हो गई है। नतीजतन, शहरवासी अब भी निर्माण कार्यों और औद्योगिक धुएं के बीच जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं और 1.50 करोड़ की यह राशि प्रशासनिक लेटलतीफी की भेंट चढ़ गई है।
आईआईटी की रिपोर्ट पर निगम के अफसरों ने फेरा पानी
दस्तावेजों के अनुसार, नगर निगम ने हवा साफ करने की इस योजना के लिए आईआईटी खड़गपुर से बकायदा एक वैज्ञानिक सर्वे कराया था। इस रिपोर्ट में शहर के प्रदूषण स्रोतों को तीन श्रेणियों (पॉइंट, लाइन और एरिया सोर्स) में बांटा गया था। हथबंद, मांढर से लेकर सिलतरा के डंपिंग जोन और कुम्हारी तक भारी वाहनों और स्टोन क्रशर से उड़ने वाली धूल को चिन्हित किया गया था। रिपोर्ट के आधार पर प्रदूषण के स्तर को देखते हुए 20 चौक-चौराहों और औद्योगिक क्षेत्रों का चयन कर लिया गया था। बजट भी 1.50 करोड़ पास हो गया था, लेकिन निगम के अधिकारियों ने कागजी कार्रवाई में ही इतना वक्त निकाल दिया कि योजना कभी जमीन पर उतर ही नहीं पाई।
समयसीमा खत्म, 15वें वित्त आयोग के फंड पर संकट
प्रोजेक्ट से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक, 15वें वित्त आयोग के तहत (2021-2026 की अवधि में) मिलने वाले टाइड फंड को खर्च करने की आखिरी तारीख 31 मार्च 2026 निर्धारित थी। तय समय में काम शुरू न होने से अब 1.50 करोड़ के इस फंड के लैप्स होने का खतरा खड़ा हो गया है। शहर में चल रहे ओवरब्रिज, फ्लाईओवर और सड़कों के निर्माण ने हवा में डस्ट पार्टिकल्स खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिए हैं। इन फव्वारों से पानी की महीन बूंदों के जरिए धूल को बैठाकर लोगों को फौरी राहत दी जानी थी। इसके साथ ही सड़कों की नियमित सफाई भी होनी थी, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई ने हवा को साफ करने का एक अहम मौका गंवा दिया।
महापौर बोली ,पुरानी सरकार का प्लान था, नया लाएंगे
योजना के यूं अधर में लटकने पर रायपुर नगर निगम की महापौर मीनल चौबे ने सफाई दी है। उनका कहना है, "यह पूर्ववर्ती सरकार की योजना थी जो सफल नहीं हो पाई। अब हम शहर का प्रदूषण कम करने के लिए नई योजना बना रहे हैं, जिससे हवा को साफ किया जा सकेगा।" हालांकि, उनके इस बयान से यह गंभीर सवाल खड़ा होता है कि जब 1.50 करोड़ का सुरक्षित फंड और आईआईटी का तैयार सर्वे निगम के पास मौजूद था, तो सिर्फ पुरानी सरकार की योजना होने के आधार पर काम में सुस्ती क्यों बरती गई।
▶ सर्वे में चिन्हित किए गए थे ये इलाके
- पॉइंट सोर्स: हथबंद, मांढर, बेन्द्री, दोंदे खुर्द और जरौंदा के वे इलाके जहां प्रदूषण का एक निश्चित केंद्र था।
- लाइन सोर्स: शहर की मुख्य सड़कें, गुरु घासीदास चौक और कुम्हारी, जहां भारी वाहनों की आवाजाही से दिनभर प्रदूषण होता है।
- एरिया सोर्स: सिलतरा का कचरा डंपिंग जोन और स्टोन क्रशर के आसपास का पूरा इलाका, जहां का दायरा काफी बड़ा है।
कैसे मिलनी थी निर्माण की धूल से राहत?
लगातार चल रहे निर्माण कार्यों से हवा में धूल के कण (PM10) तैरते रहते हैं, जो सांस के जरिए सीधे फेफड़ों में जाते हैं। वाटर फाउंटेन से निकलने वाली बौछार इन कणों को नमी देकर भारी कर देती है, जिससे वे तत्काल जमीन पर बैठ जाते हैं। जानकारों के अनुसार, यह प्रदूषण का स्थायी समाधान भले न हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर धूल नियंत्रण और हवा को सांस लेने लायक बनाने के लिए यह एक बेहद कारगर तरीका है।
नई योजना के नाम पर फिर खर्च होगा फंड?
निगम अब प्रदूषण रोकने के लिए नई योजना बनाने का दावा कर रहा है। विभागीय सूत्रों की मानें तो इस नई रूपरेखा के लिए फिर से सर्वे और कंसल्टेंसी के नाम पर लाखों का फंड आवंटित किया जा सकता है। ग्रांट की समयसीमा खत्म होने के बाद अब नए प्रोजेक्ट के लिए वित्तीय व्यवस्था कहां से होगी, इस पर अधिकारियों ने चुप्पी साध रखी है।