बिलासपुर : सरकारी जमीन पर कब्जे और उसकी अवैध खरीद-बिक्री का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने राजस्व और पंजीयन व्यवस्था की कार्यप्रणाली को भी संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया हैं। हैरानी देखिए, जिस जमीन को जल संसाधन विभाग ने 1982 में अधिग्रहित कर लिया था, जिसका मुआवजा भी संबंधित भू-स्वामियों को बांट दिया गया था, उसी जमीन की 29 साल बाद बाकायदा रजिस्ट्री हो गई। खरीदार ने न सिर्फ जमीन अपने नाम चढ़वा ली, बल्कि उस पर खेती शुरू कर दी और चारदीवारी तक खड़ी कर दी। मामला छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने साफ कर दिया कि सरकारी अधिग्रहण के बाद हुई रजिस्ट्री किसी को मालिकाना हक नहीं दे सकती। जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने खरीदार की याचिका खारिज करते हुए उसे धोखाधड़ी के लिए विक्रेता के खिलाफ दीवानी और आपराधिक कार्रवाई करने की छूट दी है।

पहले अधिग्रहण, फिर मुआवजा, 29 साल बाद जमीन की बिक्री

मामला सरगुजा जिले के ग्राम सुंदरपुर की खसरा नंबर 336/1 की जमीन से जुड़ा है। जल संसाधन विभाग ने परियोजना के लिए इस जमीन का अधिग्रहण किया था। अधिग्रहण की अधिसूचना 25 नवंबर 1980 को जारी हुई और 7 जून 1982 को अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। इसके बदले उर्वशी सिंह सहित संबंधित भू-स्वामियों को मुआवजे का भुगतान भी कर दिया गया। लेकिन विभाग ने अधिग्रहण के बाद लंबे समय तक जमीन पर भौतिक कब्जा नहीं किया। इसी बीच जमीन की खरीद-बिक्री का खेल हो गया। उर्वशी सिंह ने 29 अप्रैल 2011 को इसी अधिग्रहित जमीन का 0.121 हेक्टेयर हिस्सा पंकज अग्रवाल को महज 62 हजार रुपये में बेच दिया। पंजीयन कार्यालय में रजिस्ट्री भी हो गई। बाद में खसरा नंबर बदलकर 336/3 हो गया और खरीदार ने राजस्व रिकॉर्ड में भी अपना नाम दर्ज करा लिया।

सरकारी जमीन पर खेती, चारदीवारी और विभाग को खबर तक नहीं

रजिस्ट्री के बाद खरीदार ने जमीन पर खेती शुरू कर दी और चारदीवारी बनाकर कब्जा भी जमा लिया। दूसरी ओर जल संसाधन विभाग को लंबे समय तक इसकी जानकारी नहीं हुई। जब विभाग ने सुंदरपुर में अपनी परियोजना शुरू करने की तैयारी की और अधिग्रहित जमीन पर कब्जा लेने की प्रक्रिया शुरू की, तब इस पूरे मामले का खुलासा हुआ। विभाग के एसडीओ ने 19 फरवरी 2021 को कब्जाधारी को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर 0.453 हेक्टेयर जमीन खाली करने का निर्देश दिया। नोटिस में स्पष्ट किया गया कि जमीन 1982 में अधिग्रहित की जा चुकी है और इसके एवज में मुआवजा भी बांटा जा चुका है।

खरीदार: रजिस्ट्री कराई है, अतिक्रमणकारी कैसे?

विभाग के नोटिस को चुनौती देते हुए पंकज अग्रवाल ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि उन्होंने जमीन विधिवत रजिस्ट्री के जरिए खरीदी है। उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है और वे जमीन पर खेती भी कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें अतिक्रमणकारी नहीं कहा जा सकता। वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि जमीन का अधिग्रहण बिक्री से करीब तीन दशक पहले ही पूरा हो चुका था। मुआवजा भी संबंधित भू-स्वामियों को दिया जा चुका था। ऐसे में पूर्व भू-स्वामी द्वारा जमीन बेचकर खरीदार के साथ धोखाधड़ी की गई है।

हाई कोर्ट ने दिया सुप्रीम कोर्ट का हवाला  

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली विकास प्राधिकरण बनाम दामिनी वाधवा मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमीन का पूर्व मालिक उस पर अधिकार नहीं रखता। ऐसे में अधिग्रहण के बाद जमीन खरीदने वाला व्यक्ति बाद का खरीदार माना जाएगा। उसके पक्ष में की गई रजिस्ट्री से अधिग्रहित जमीन पर कोई मालिकाना हक पैदा नहीं होता।

अदालत ने पाया कि जमीन की अधिग्रहण अधिसूचना 25 नवंबर 1980 को जारी हो चुकी थी, जबकि पंकज अग्रवाल ने 2011 में जमीन खरीदी थी। यानी जिस जमीन को बेचने का अधिकार विक्रेता के पास ही नहीं बचा था, उसी की रजिस्ट्री करा ली गई। हाई कोर्ट ने खरीदार की याचिका खारिज कर दी। हालांकि अदालत ने यह रास्ता खुला रखा है कि यदि विक्रेता ने अधिग्रहित जमीन बेचकर उनके साथ धोखाधड़ी की है तो वे उसके खिलाफ दीवानी और आपराधिक कार्रवाई कर सकते हैं।