
बिलासपुर : शिक्षा विभाग के बहुचर्चित फर्जी मेडिकल बिल घोटाले में आखिरकार 10 महीने की लंबी खामोशी के बाद सिटी कोतवाली पुलिस ने शिक्षक नेता एवं संकुल समन्वयक साधेलाल पटेल के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र सहित गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली है, लेकिन इस कार्रवाई के साथ ही सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि क्या इतने बड़े फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड केवल एक शिक्षक था, या फिर पूरा सिस्टम उसके साथ खड़ा था ?
शिक्षा विभाग के गलियारों में चर्चा है कि बीईओ कार्यालय से लेकर डीईओ कार्यालय तक कई जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच किए बिना इस घोटाले की पूरी सच्चाई सामने नहीं आएगी । आखिर करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये के फर्जी मेडिकल बिल बिना कई स्तरों की जांच और अनुमोदन के कैसे पास हो गए ?
10 महीने तक किसने दबाकर रखी एफआईआर?
सबसे हैरानी की बात यह है कि संयुक्त संचालक (जेडी) शिक्षा के आदेश, जिला शिक्षा अधिकारी की जांच रिपोर्ट और बीईओ की शिकायत के बावजूद करीब 10 महीने तक एफआईआर दर्ज ही नहीं हुई । इस दौरान प्रश्न उठते रहे कि आखिर आरोपी को बचाने की कोशिश कौन कर रहा था ? क्या किसी राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के कारण कार्रवाई टलती रही ? अब जब एफआईआर दर्ज हुई है तो यह चर्चा भी तेज हो गई है कि अगर शुरुआत में ही कार्रवाई हो जाती तो शायद पहले ही पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकता था ।
मृत शिक्षक के नाम पर भी नहीं आई शर्म
जांच रिपोर्ट में सामने आया कि आरोपी साधेलाल पटेल ने मृत सहायक शिक्षक नरेंद्र कुमार चौधरी के नाम पर भी फर्जी मेडिकल प्रतिपूर्ति का खेल खेला हैं । बताया गया कि करीब 33 हजार रुपये के वास्तविक मेडिकल बिल में कथित तौर पर छेड़छाड़ कर उसे 5.33 लाख रुपये का बना दिया गया । यही नहीं, भुगतान हो जाने के बाद भी दस्तावेजों में कथित कूटरचना कर दोबारा राशि निकालने की कोशिश की गई । जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने अपने, अपनी पत्नी और अन्य शिक्षकों के नाम पर भी फर्जी मेडिकल प्रतिपूर्ति के बिल लगाकर करीब 30 लाख रुपये के घोटाले को अंजाम दिया ।
फर्जी बिल, फर्जी रसीदें और सरकारी खजाने पर डाका
डीईओ की जांच रिपोर्ट के अनुसार, स्वयं के नाम पर लगभग 7लाख 73 हजार रुपये का मेडिकल दावा प्रस्तुत किया गया, जबकि मूल बिल करीब 77 हजार रुपये का था । पत्नी राजकुमारी पटेल के नाम पर 4लाख 3हजार और बाद में 7लाख 32हजार रुपये के मेडिकल दावे लगाए गए, जबकि वास्तविक बिल कुछ हजार रुपये के बताए गए । अन्य शिक्षकों के नाम पर भी मेडिकल प्रतिपूर्ति राशि में कथित छेड़छाड़ कर लाखों रुपये के दावे पेश किए गए । जांच में कई मेडिकल बिलों और रसीदों में कूटरचना, राशि बढ़ाने और दस्तावेजों से छेड़छाड़ की पुष्टि होने की बात कही गई है ।
क्या अफसरों की मिलीभगत से खेला खेल ?
यही वह प्रश्न है जो पूरे मामले को और गंभीर बना देता है । मेडिकल प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया में फाइलें स्कूल, संकुल, बीईओ कार्यालय, डीईओ कार्यालय और कोषालय जैसे कई स्तरों से गुजरती हैं । ऐसे में प्रश्न उठ रहा है कि क्या किसी कर्मचारी या अधिकारी ने दस्तावेजों की जांच नहीं की, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं ? अगर फर्जी दस्तावेज इतने लंबे समय तक पास होते रहे तो जिम्मेदारी केवल एक व्यक्ति पर तय करना पर्याप्त होगा या पूरे तंत्र की भूमिका की भी जांच होगी ?
संयुक्त संचालक ने किया था निलंबित
जिला शिक्षा अधिकारी की जांच रिपोर्ट में अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद संयुक्त संचालक शिक्षा ने साधेलाल पटेल को निलंबित करते हुए उनका मुख्यालय रतनपुर बीईओ कार्यालय निर्धारित किया था । आदेश में उनके कृत्य को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियमों के विपरीत गंभीर अनैतिक कार्य माना गया ।
बीईओ ने 2025 में ही लिख दी थी एफआईआर की चिट्ठी
बिल्हा के तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी ने 13 अक्टूबर 2025 को ही सिटी कोतवाली पुलिस को पत्र लिखकर प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया था । पत्र में स्पष्ट उल्लेख था कि संयुक्त संचालक और जिला शिक्षा अधिकारी के निर्देश पर एफआईआर दर्ज कर विधिसम्मत कार्रवाई की जाए । इसके बावजूद मामला महीनों तक आगे नहीं बढ़ा ।
जांच रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने किया मामला दर्ज
सीएसपी बिलासपुर गगन कुमार के अनुसार, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से फर्जी मेडिकल बिल और दस्तावेजों के आधार पर सरकारी राशि निकालने की शिकायत प्राप्त हुई थी । जांच रिपोर्ट के आधार पर आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की समकक्ष धाराओं (पूर्व आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 एवं 34 के अनुरूप) के तहत अपराध दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है ।
एफआईआर के बाद बढ़ीं उम्मीदें, शुरू हुई पुलिस की अग्निपरिक्षा
एफआईआर दर्ज होना कार्रवाई की शुरुआत है, अंत नहीं । अब पूरे जिले की नजर इस बात पर है कि क्या तत्कालीन बीईओ और डीईओ कार्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों से पूछताछ होगी ? फर्जी बिल किस स्तर पर पास हुए ? सरकारी खजाने से निकली रकम की वसूली कैसे होगी ? और सबसे बड़ा प्रश्न यह हैं कि क्या इस घोटाले के पीछे बैठे मुखौटाधारी लोग भी बेनकाब होंगे और कानून के शिकंजे में आएंगे या फिर पूरा मामला केवल एक शिक्षक तक ही सीमित कर दिया जाएगा ?
अब यह जांच तय करेगी कि कार्रवाई केवल एक आरोपी तक सीमित रहती है या शिक्षा विभाग के भीतर छिपे पूरे फर्जीवाड़े के नेटवर्क का भी पर्दाफाश होता है ।