
रायपुर। युवाओं के हाथों में हुनर देकर उन्हें रोजगार के काबिल बनाने के लिए चल रहे लाइवलीहुड ट्रेनिंग सेंटर की ग्राउंड रिपोर्ट कागजी दावों की पोल खोल रही है। ट्रेनिंग तो दी जा रही है, मगर कोर्स पूरा होने के बाद युवाओं के हाथ में बस सर्टिफिकेट थमा दिया गया है। और युवा नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
आंकड़ों की जमीनी हकीकत
वित्तीय वर्ष 2025-26 की बात करें, तो रायपुर जिले में 643 युवाओं को अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण दिया गया था। कागजों में 550 युवाओं को नौकरी मिलने का भारी-भरकम दावा ठोक दिया गया है। हालांकि, विभागीय जानकारी के अनुसार महज 60 से 70 फीसदी युवाओं को ही रोजगार मिला । शेष बचे युवा आज भी काम की तलाश में दर दर भटक रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि पुरानी बैच को पूरी तरह से खपाया नहीं जा सका है, और इस साल 1050 नए युवाओं को ट्रेनिंग देने का लक्ष्य थमा दिया गया है।
रोजगार का ताना-बाना
लाइवलीहुड कॉलेज में युवाओं को उनकी पसंद के हिसाब से प्लंबिंग, कंप्यूटर हार्डवेयर, ब्यूटीशियन, सिलाई-कढ़ाई और हॉस्पिटैलिटी जैसे कई ट्रेड में मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता है। मकसद यह है कि युवा अपना खुद का काम शुरू करें या उन्हें कहीं नौकरी मिल जाए। प्रक्रिया भी कागजों में पूरी तरह से तय है, लेकिन ट्रेनिंग और असल रोजगार के बीच भारी झोल नजर आ रहा है।
प्रशिक्षुओं की पीड़ा: "महीनों पसीना बहाया, हाथ में सिर्फ सर्टिफिकेट"
- ठाकुर राम: इन्होंने प्रशिक्षण लिया। पंचायत स्तर पर नियुक्ति की प्रक्रिया भी हुई, लेकिन पंचायत ने दो टूक कह दिया कि काम नहीं है। वहां कोई पद खाली नहीं है। ऊपर से यह पेंच भी फंसा है कि नियुक्ति हो भी गई, तो वेतन कौन देगा।
- सागर यादव: इसी आस में तीन महीने तक कॉलेज के चक्कर काटे कि परीक्षा पास करते ही नौकरी पक्की हो जाएगी। नतीजा सिफर रहा। महीनों कॉलेज में पसीना बहाने के बाद भी हाथ खाली हैं।
- यशवंत साहू: लगभग 10 महीने पहले ट्रेनिंग ली थी। आज तक काम का अता-पता नहीं है। अधिकारियों को आवेदन भी सौंप चुके हैं कि ट्रेनिंग के आधार पर रोजगार दिया जाए।
प्लंबिंग की ट्रेनिंग ली, फिर भी काम का अकाल
जल जीवन मिशन के तहत 'नल-जल मित्र' योजना इसका सटीक उदाहरण है। गांवों में पानी की टंकियों और पाइपलाइन के रखरखाव के लिए करीब 98 युवाओं को प्लंबिंग की ट्रेनिंग दी गई। पीएचई विभाग ने ग्राम पंचायतों को बकायदा पत्र लिखकर इनकी नियुक्ति करने को कहा था। 10 से 16 हजार रुपए महीने की पगार मिलने का ख्वाब दिखाया गया था। पर जमीनी हकीकत यह है कि 70 से ज्यादा युवा आज भी खाली बैठे हैं।
क्या कहते है जिम्मेदार
मैंने अभी-अभी जॉइन किया है। प्रशिक्षण के बाद कितने लोगों को नौकरी मिल रही है और कितनों को नहीं मिल रही है, इसकी समीक्षा कर समाधान निकाला जाएगा।"
शरतचंद्र शुक्ला, प्राचार्य, लाइवलीहुड कॉलेज, रायपुर