लोकतंत्र की हत्या में भागीदार रहे एंकरों को अब आई पत्रकार संगठनों की याद, जब खुद पर आंच आई तो मांगने लगे मदद

बिलासपुर । लोकतंत्र की हत्या में बराबर की भागीदार रही गोदी मीडिया की हालत आज 'आषाढ़ की कु...' जैसी हो गई है। अपना अंतिम समय करीब देखते हुए अब यह मीडिया घबराहट में ऐसे प्रयास कर रही है जिससे उसकी बची-खुची साख किसी तरह बच सके। सत्ता की गोद में बैठकर पत्रकारिता करने वाले अब यह चाहते हैं कि उनके मददगार पत्रकार संगठन आगे आएं। देश भर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान जनता के कोप का भागीदार बन रहे पत्रकारों के पक्ष में ये संगठन तत्काल प्रस्ताव पास करें। उनके साथ सड़क पर हो रहे दुर्व्यवहार की निंदा की जाए और इस संदर्भ में एक प्रस्ताव तैयार करके उचित माध्यम से दिल्ली प्रेस क्लब और एडिटर गिल्ड को भेजा जाए।

लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आज निंदा प्रस्ताव की मांग करने वाले ये पत्रकार संगठन उस समय कहां जाकर छिप गए थे, जब स्वतंत्र पत्रकारिता को कुचला जा रहा था। जब द वायर, न्यूज़ लॉन्ड्री, न्यूज़ क्लिक, बीबीसी जैसे संस्थानों और दर्जनों निष्पक्ष पत्रकारों के खिलाफ ईडी (ED) और यूएपीए (UAPA) के तहत साजिश पूर्वक कार्यवाही की गई, तब ये सारे संगठन और एंकर चुप रहे।

केरल से निकले उस पत्रकार का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है, जो उत्तर प्रदेश में एक बलात्कार पीड़िता के संदर्भ में कवरेज करने जा रहा था। उस पत्रकार को रास्ते में रोककर सालों तक जेल की सलाखों के पीछे रखा गया। अचरज की बात यह थी कि उसके बैंक अकाउंट में मौजूद मात्र 50,000 रुपए जैसी साधारण रकम को भी जांच का आधार बनाकर ईडी के दायरे में ला दिया गया। जम्मू कश्मीर की वादियों से लेकर मणिपुर तक ऐसे कई उदाहरण बिखरे पड़े हैं, जब जनता की वास्तविक आवाज बनने वाले पत्रकारों और प्रेस की आजादी को सरकार ने ताकत के बल पर कुचल दिया। उस वक्त आज न्याय मांगने वाले ये सारे चीयर लीडर एंकर खामोश बैठकर तमाशा देखते रहे।

आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। जब आग अपने खुद के स्कर्ट में लग गई है, तो ये लोग चारो तरफ मदद के लिए गुहार लगा रहे हैं। सत्ता के गुरुर में ये भूल गए कि पूरे देश में पेट्रोल छिड़कने का यंत्र वे खुद ही थे। वे उसी डंगाल (डाल) पर बैठकर मजे ले रहे थे, जिस डंगाल को वे जानबूझकर अपने ही हाथों से काट रहे थे। उस समय इन्हें यह बिल्कुल याद नहीं आया कि एक दिन हमारे ऊपर या हमारे खिलाफ भी कुछ हो सकता है और वक्त पलट भी सकता है।

आज सड़क पर जो आक्रोश दिख रहा है, वह उसी का नतीजा है। पुरानी कहावत है कि जैसी करनी वैसी भरनी। यह कहावत आज पूरी तरह से सही चरितार्थ हो रही है। दूसरों को आग में झोंकने वाले आज खुद उसी आंच में झुलस रहे हैं।