रायपुर | राज्य के सरकारी कर्मचारियों के लिए अब तक बीमारी से ठीक होने के बाद की स्थिति अधिक कष्टदायक रही है। हर साल 15 हजार से अधिक कर्मचारी निजी अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए जाते हैं। सरकार हर वर्ष औसतन 200 करोड़ रुपए से अधिक चिकित्सा प्रतिपूर्ति (मेडिकल रीइम्बर्समेंट) पर खर्च करती है। इसके बावजूद असली दर्द अस्पताल से लौटने के बाद शुरू होता था, जब कर्मचारियों को अपने ही पैसों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे।

इसी मानसिक प्रताड़ना और बाबुओं की मनमानी को खत्म करने के लिए नई कैशलेस स्कीम की रूपरेखा तैयार की गई है। पुरानी व्यवस्था में इलाज करवाने में जितनी तकलीफ होती थी, उससे कहीं ज्यादा परेशानी बिल पास करवाने में होती थी। दफ्तरों में दो-दो, तीन-तीन साल तक फाइलें अटकना एक आम बात रही है। पहले 25 हजार तक का बिल जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी पास करते रहे हैं। 1 लाख तक की फाइल जॉइंट डायरेक्टर और 1 लाख से अधिक तथा 5 लाख तक का बिल डायरेक्टर हेल्थ सर्विसेज (डीएचएस) की कमेटी के पास जाता था।

इन लापरवाह कमेटियों का हाल यह था कि नियमानुसार जिला स्तर पर हर 15 दिन में और राज्य स्तर पर हर महीने बैठक होनी चाहिए थी। हकीकत में राज्य स्तरीय कमेटी की साल में एकाध या मुश्किल से दो बार ही बैठक हो पाती थी। कमेटियां न बैठने और बाबू स्तर पर फाइलें दबाए रखने के कारण सैकड़ों कर्मचारी बिल मंजूरी के इंतजार में भटकते रहे हैं। सिस्टम की स्थिति यह रही कि मंत्रालय में जॉइंट डायरेक्टर रैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी को महीनों चक्कर कटवाने के बाद निचले स्तर से जवाब मिला कि उनकी फाइल ही गायब हो गई है। बीमारी से उबरे इस अफसर को अपने पैसों के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। एक अन्य मामले में पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी ने लाखों रुपए खर्च कर किडनी ट्रांसप्लांट कराया, लेकिन 1 लाख से ऊपर का बिल होने के कारण मामला संचालनालय में अटका रहा। संचालनालय की बैठक 6 महीनों से नहीं होने के कारण वह मरीज कर्ज चुकाने के लिए भटकता रहा।

निजी अस्पतालों का पैकेज महंगा और सीजीएचएस रेट कम होने के कारण भारी नुकसान कर्मचारी को उठाना पड़ता था। नई व्यवस्था से ये सारी दिक्कतें समाप्त हो जाएंगी। अब मोबाइल में ही डिजिटल मेडिकल कार्ड उपलब्ध होगा। जेब से एक रुपया नहीं देना होगा। अनुबंधित अस्पताल में सिर्फ कार्ड दिखाकर भर्ती हुआ जा सकेगा। नो रिफरल के तहत सरकारी अस्पताल से रिफर बनवाने की अनिवार्यता खत्म होगी और मान्यता प्राप्त प्राइवेट अस्पताल में इलाज मिल सकेगा। फिक्स्ड रेट के अनुसार अस्पतालों को तय सरकारी दरों पर ही इलाज करना होगा।

इस पूरी प्रक्रिया पर सहमति के लिए हुई बैठक में छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन, मंत्रालयीन कर्मचारी संघ, राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, राजपत्रित अधिकारी संघ, वित्त सेवा अधिकारी संघ, वन कर्मचारी संघ, निशक्त शासकीय अधिकारी कर्मचारी कल्याण संघ, प्रदेश तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ, स्वास्थ्य कर्मचारी संघ, स्वास्थ्य संयोजक कर्मचारी संघ और वन विभागीय वाहन/कर्मचारी संघ के पदाधिकारी शामिल हुए।