छत्तीसगढ़ में शिक्षा का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) के तहत निजी स्कूलों को मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि से जुड़ा है।

Right of Children to Free and Compulsory Education Act के तहत निजी स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना होता है। इसके बदले राज्य सरकार उन्हें प्रति विद्यार्थी तय राशि के अनुसार प्रतिपूर्ति देती है।

लेकिन छत्तीसगढ़ में यह राशि पिछले 13 वर्षों से नहीं बढ़ी। अब निजी स्कूलों ने साफ कहा है — “जब तक प्रतिपूर्ति नहीं बढ़ेगी, सहयोग नहीं मिलेगा।”



13 साल से नहीं बढ़ी प्रतिपूर्ति राशि

छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन का कहना है कि वर्ष 2012 के आसपास तय की गई राशि आज भी लागू है।

मौजूदा दरें इस प्रकार हैं:

  • प्राथमिक कक्षाओं के लिए: ₹7000 प्रति विद्यार्थी प्रति वर्ष
  • माध्यमिक स्तर: ₹11,500 प्रति विद्यार्थी
  • हाई एवं हायर सेकेंडरी: अधिकतम ₹15,000

स्कूल प्रबंधन का तर्क है कि बीते एक दशक में महंगाई, वेतनमान, बिजली, किराया और इंफ्रास्ट्रक्चर लागत में भारी वृद्धि हुई है। लेकिन प्रतिपूर्ति राशि जस की तस रही।

सीधी भाषा में कहें तो खर्च 2026 का है, लेकिन भुगतान 2012 वाला।


हाईकोर्ट बिलासपुर का आदेश और लंबित फैसला

इस मुद्दे को लेकर एसोसिएशन ने उच्च न्यायालय बिलासपुर में याचिका क्रमांक WPC 4988/2025 दायर की।

19 सितंबर 2025 को दिए गए अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग को छह महीने के भीतर मांगों पर निर्णय लेने के निर्देश दिए।

लेकिन एसोसिएशन के अनुसार, निर्धारित समयसीमा बीतने के बाद भी कोई ठोस फैसला सामने नहीं आया।

कानूनी आदेश के बाद भी प्रशासनिक देरी ने निजी स्कूलों की नाराज़गी बढ़ा दी।


निजी स्कूलों की प्रमुख मांगें

एसोसिएशन ने स्पष्ट रूप से नई दरों की मांग रखी है:

  • प्राथमिक: ₹7000 से बढ़ाकर ₹18,000
  • माध्यमिक: ₹11,500 से बढ़ाकर ₹22,000
  • हाई एवं हायर सेकेंडरी: ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000

साथ ही उन्होंने यह भी मांग की है कि बढ़ी हुई राशि पिछले तीन वर्षों से प्रभावी मानी जाए।

उनका कहना है कि वे वास्तविक खर्च के आधार पर यह मांग कर रहे हैं, न कि मनमानी दर से।


असहयोग आंदोलन: क्या होगा इसका असर?

1 मार्च को हुई प्रदेश कार्यकारिणी बैठक में सर्वसम्मति से असहयोग आंदोलन का निर्णय लिया गया।

एसोसिएशन ने ऐलान किया कि जब तक प्रतिपूर्ति राशि नहीं बढ़ती, तब तक:

  • शिक्षा विभाग के किसी भी कार्य में सहयोग नहीं करेंगे
  • विभाग से जारी पत्र, नोटिस या आदेश का जवाब नहीं देंगे

यह निर्णय पूरे प्रदेश के निजी स्कूलों पर लागू होगा।

हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि RTE के तहत बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखा जाएगा।


RTE नियम

Right of Children to Free and Compulsory Education Act की धारा 12(1)(c) के तहत निजी अनुदानरहित स्कूलों को 25% सीटें EWS और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं।

राज्य सरकार संबंधित स्कूल को प्रति छात्र प्रतिपूर्ति देती है। यह राशि या तो राज्य के प्रति छात्र व्यय के बराबर होती है या स्कूल की वास्तविक फीस के बराबर — जो भी कम हो।

यानी सिद्धांत साफ है: गरीब बच्चे पढ़ें, और स्कूल को उसका खर्च मिले।


गरीब बच्चों की शिक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा

एसोसिएशन का कहना है कि वे सीमित संसाधनों में RTE छात्रों को शिक्षा दे रहे हैं।

अगर प्रतिपूर्ति राशि लागत से काफी कम रहेगी, तो स्कूलों पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा।

वहीं, शिक्षा विभाग की ओर से आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह विवाद लंबा खिंचता है, तो प्रशासनिक कामकाज प्रभावित हो सकता है।

लेकिन फिलहाल पढ़ाई जारी है। यह राहत की बात है।


क्या मांग वाजिब है?

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कई राज्यों ने समय-समय पर RTE प्रतिपूर्ति राशि में संशोधन किया है।

महंगाई दर, शिक्षक वेतन आयोग की सिफारिशें और स्कूल संचालन लागत लगातार बढ़ी है।

ऐसे में 13 साल तक राशि स्थिर रखना आर्थिक दृष्टि से सवाल खड़ा करता है।

हालांकि अंतिम निर्णय राज्य सरकार के बजट और वित्तीय प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।


प्रशासन के साथ संवाद की जरूरत

यह मुद्दा टकराव से ज्यादा संवाद की मांग करता है।

शिक्षा एक संवेदनशील विषय है। यहां जिद से ज्यादा संतुलन काम आता है।

अगर विभाग और एसोसिएशन एक टेबल पर बैठें, तो समाधान जल्दी निकल सकता है।

हाईकोर्ट के निर्देश पहले ही स्पष्ट हैं। अब प्रशासनिक स्तर पर पहल की जरूरत है।


डेटा के अनुसार

भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट्स बताती हैं कि RTE के तहत लाखों बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश मिला है।

छत्तीसगढ़ में भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी इस योजना से लाभान्वित हुए हैं।

इसलिए प्रतिपूर्ति व्यवस्था का सुचारू रहना जरूरी है।

यह केवल स्कूलों का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है।


अब सबकी नजर राज्य सरकार के अगले कदम पर है।

क्या विभाग संशोधित दरों की घोषणा करेगा?

क्या कोई अंतरिम समाधान निकलेगा?

या मामला फिर अदालत पहुंचेगा?

फिलहाल इतना तय है कि यह मुद्दा शिक्षा नीति और वित्तीय संतुलन के बीच की खाई को उजागर करता है।



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