
Chhattisgarh MBBS Admission News: छत्तीसगढ़ में एमबीबीएस एडमिशन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में दूसरे राज्यों के छात्रों को छत्तीसगढ़ स्टेट कोटे के तहत प्रवेश दिए जाने का आरोप लगा है। इस मामले में 10 छात्रों ने कमिश्नर मेडिकल एजुकेशन (DME) कार्यालय पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि दस्तावेजों की जांच में गंभीरता नहीं बरती गई, जिसके चलते गैर-निवासी छात्रों को राज्य कोटे की सीटें मिल गईं और स्थानीय अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित हुए।
शिकायत सामने आने के बाद मेडिकल एजुकेशन कमिश्नर रितेश अग्रवाल ने मामले की जांच कराने की बात कही है। शिकायतकर्ताओं ने कथित तौर पर नियमों के विपरीत हुए प्रवेशों को रद्द करने और पात्र स्थानीय अभ्यर्थियों को मौका देने की मांग की है। हालांकि, ये आरोप हैं और संबंधित एडमिशन की वैधता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड के छात्रों के एडमिशन पर आपत्ति
शिकायत में अलग-अलग राज्यों की छात्राओं को छत्तीसगढ़ के मेडिकल कॉलेजों में स्टेट कोटे के तहत प्रवेश दिए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, ओडिशा और महाराष्ट्र की छात्राओं को जांजगीर-चांपा के मेडिकल कॉलेजों में, जबकि झारखंड की एक छात्रा को अंबिकापुर में एडमिशन दिया गया है। इसके अलावा, दो निजी मेडिकल कॉलेजों और एक निजी डेंटल कॉलेज में हुए कुछ अन्य प्रवेशों को लेकर भी आपत्ति जताई गई है। शिकायतकर्ताओं ने संबंधित छात्रों के एडमिशन की जांच कर नियमों के विपरीत पाए जाने पर प्रवेश निरस्त करने की मांग की है।
हाईकोर्ट तक पहुंचा था मामला, याचिका खारिज
इस विवाद को लेकर शिकायत करने वाले छात्रों ने पहले हाईकोर्ट का भी रुख किया था। याचिका में स्टेट कोटे के लिए अलग से मेरिट लिस्ट जारी नहीं किए जाने का मुद्दा उठाया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कोर्ट ने कहा था कि ठोस दस्तावेज होने पर दोबारा याचिका दायर की जा सकती है। प्रदेश में स्टेट कोटे के लिए अलग से सूची जारी नहीं की जाती। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इसी व्यवस्था के बीच कथित फर्जी डोमिसाइल प्रमाणपत्रों के जरिए बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों के प्रवेश का मामला सामने आता रहा है।
दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
शिकायत में मेडिकल कॉलेजों में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, स्क्रूटिनी के दौरान अधिकारी मुख्य रूप से यह जांचते हैं कि प्रमाणपत्र सक्षम अधिकारी द्वारा जारी किया गया है या नहीं। आरोप है कि प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारी की वैधता देखने के बावजूद अभ्यर्थी के छत्तीसगढ़ का मूल निवासी होने की पर्याप्त जांच नहीं हो पाती।
ऐसे मामलों में शिकायत मिलने के बाद ही विस्तृत जांच की स्थिति बनती है। इससे पहले भी प्रदेश में फर्जी प्रमाणपत्रों को लेकर कार्रवाई हो चुकी है। इसी साल सिम्स में कथित फर्जी EWS प्रमाणपत्र के मामले में तीन छात्रों का प्रवेश रद्द किया गया था। करीब 10 साल पहले रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में भी एक छात्र का एडमिशन निरस्त किया गया था।
DME कमिश्नर बोले- शिकायत मिली, जांच के लिए भेजा मामला
मेडिकल एजुकेशन कमिश्नर रितेश अग्रवाल के मुताबिक, दूसरे राज्यों की छात्राओं को सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश दिए जाने की शिकायत प्राप्त हुई है। मामले को जांच के लिए भेजा गया है। उन्होंने बताया कि एडमिशन के दौरान दस्तावेजों का सत्यापन किया जाता है और सक्षम अधिकारियों के हस्ताक्षर वाले प्रमाणपत्रों को वैध मानकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। फिलहाल, जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि संबंधित छात्रों ने प्रवेश के लिए पात्रता संबंधी नियमों का पालन किया था या नहीं। जांच के निष्कर्षों और विभागीय कार्रवाई पर अब अभ्यर्थियों की नजर बनी हुई है।