रायपुर। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में तारा कोयला ब्लॉक की नीलामी के बाद एक बार फिर जंगल और खनन का मुद्दा गरमा गया है। तारा कोल ब्लॉक को CG Syngas and Chemicals Limited ने हासिल किया है, जिसका संबंध अडानी समूह की कॉरपोरेट संरचना से बताया जा रहा है। इस घटनाक्रम के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं और हसदेव क्षेत्र में लंबे समय से आंदोलन कर रहे आदिवासी समुदायों की चिंताएं फिर सामने आई हैं। उनका कहना है कि तारा क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और यहां खनन बढ़ने से जंगल, वन्यजीवों तथा स्थानीय समुदायों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

तारा की नीलामी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि हसदेव अरण्य में नए कोयला ब्लॉकों के विस्तार को लेकर छत्तीसगढ़ में पहले भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध होता रहा है। 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन से जुड़े मुद्दे पर सर्वसम्मति से एक शासकीय संकल्प पारित किया था। इसके बाद तारा समेत कुछ कोयला ब्लॉकों की नीलामी को लेकर भी राज्य सरकार की आपत्ति सामने आई थी। अब तारा ब्लॉक की नीलामी के बाद सवाल उठ रहा है कि राज्य की मौजूदा नीति में आखिर क्या बदलाव आया और हसदेव को लेकर सरकार का वर्तमान रुख क्या है?images

तारा कोल ब्लॉक क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से में फैला एक महत्वपूर्ण वन क्षेत्र है। यह इलाका केवल खनिज संपदा के कारण महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यहां मौजूद घने जंगल, जल स्रोत, वन्यजीव और आदिवासी आबादी इसे पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील बनाते हैं।

तारा कोल ब्लॉक भी इसी व्यापक वन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े समूहों का दावा है कि इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों के विस्तार से बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। पेड़ों की कटाई के साथ-साथ सड़क, खनन ढांचे और परिवहन व्यवस्था के विस्तार से जंगल के अलग-अलग हिस्सों के बीच संपर्क प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

हालांकि, किसी परियोजना के वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव और पेड़ों की कटाई की अंतिम संख्या संबंधित पर्यावरणीय मंजूरियों, परियोजना दस्तावेजों और स्वीकृत खनन योजना पर निर्भर करेगी। इसलिए अलग-अलग पक्षों की ओर से बताए जा रहे आंकड़ों को अंतिम सरकारी आंकड़ा मानने से पहले आधिकारिक दस्तावेजों से मिलान करना जरूरी है।Why India Should Rethink Over Coal Mining in Hasdeo Arand Forest

हसदेव में पहले से मौजूद हैं कई खनन परियोजनाएं
हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन का विवाद नया नहीं है। परसा ईस्ट एंड केते बासन (PEKB) और अन्य कोयला ब्लॉकों को लेकर लंबे समय से विवाद और आंदोलन होते रहे हैं। खनन परियोजनाओं के संचालन और विस्तार को लेकर स्थानीय ग्रामीणों तथा पर्यावरण कार्यकर्ताओं की ओर से विरोध किया जाता रहा है। आलोचकों का कहना है कि हसदेव में एक के बाद एक खनन परियोजनाओं के विस्तार से जंगल पर सामूहिक प्रभाव को अलग-अलग परियोजनाओं के स्तर पर देखने के बजाय पूरे लैंडस्केप के स्तर पर देखने की जरूरत है। उनके मुताबिक, एक परियोजना का असर केवल उसके लीज क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सड़क, बिजली, पानी, परिवहन और खनन से जुड़ी अन्य गतिविधियां आसपास के क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकती हैं।

सबसे बड़ा सवाल- 2022 के विधानसभा संकल्प का क्या हुआ?
तारा कोल ब्लॉक को लेकर राजनीतिक बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 2022 में पारित विधानसभा संकल्प है। उस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने हसदेव अरण्य में खनन विस्तार के विरोध में अपनी सहमति जताई थी। अब तारा की नीलामी के बाद सरकार से यह सवाल पूछा जा रहा है कि उस संकल्प का मौजूदा स्थिति में क्या महत्व रह गया है। यदि सरकार की नीति में बदलाव हुआ है तो इसकी वजह क्या है? क्या परिस्थितियों में ऐसा कोई बदलाव आया है जिसके आधार पर अब तारा जैसे ब्लॉक में व्यावसायिक खनन का रास्ता खुला है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विधानसभा का संकल्प उस समय हसदेव को लेकर राज्य की सामूहिक राजनीतिक चिंता को दर्शाता था। ऐसे में सरकार की ओर से इस मुद्दे पर स्पष्ट स्थिति सामने रखना जरूरी हो जाता है।

2023 में नीलामी रोकने की कोशिश का भी जिक्र
हसदेव के आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार, तारा समेत कुछ कोयला ब्लॉकों की नीलामी का विरोध पहले भी किया गया था। उनका दावा है कि वर्ष 2023 में ग्राम सभाओं और तत्कालीन राज्य सरकार की आपत्तियों के बाद केंद्र स्तर पर कुछ ब्लॉकों को नीलामी प्रक्रिया से हटाया गया था। आंदोलनकारियों का कहना है कि उस समय हसदेव के पर्यावरणीय महत्व और प्रस्तावित हाथी रिजर्व से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आपत्ति दर्ज कराई गई थी। अब जब तारा ब्लॉक की नीलामी दोबारा हुई है, तो वे जानना चाहते हैं कि उस समय की आपत्तियों और राज्य सरकार की वर्तमान स्थिति के बीच क्या बदलाव आया। इस पूरे मामले में राज्य सरकार की ओर से विस्तृत और स्पष्ट जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है, ताकि यह सामने आ सके कि नीलामी की मौजूदा प्रक्रिया में राज्य की आपत्ति की स्थिति क्या रही और किन परिस्थितियों में ब्लॉक को फिर नीलामी के लिए उपलब्ध कराया गया।Threatened by coal mining, Hasdeo Arand forest is receiving a groundswell  of support on the internet

Commercial Mining ने बढ़ाई चिंता
तारा कोल ब्लॉक को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका Commercial Coal Mining के लिए दिया जाना है। पारंपरिक कैप्टिव कोयला खदानों में उत्पादित कोयला किसी निर्धारित अंतिम उपयोग, जैसे बिजली उत्पादन या अन्य औद्योगिक जरूरतों से जुड़ा हो सकता है। इसके विपरीत कमर्शियल माइनिंग व्यवस्था में निर्धारित नियमों के तहत कोयला निकालकर बाजार में बिक्री की जा सकती है।

इसी वजह से हसदेव के आलोचक इसे केवल एक बिजली परियोजना के लिए कोयला उपलब्ध कराने की योजना से अलग मान रहे हैं। उनका तर्क है कि व्यावसायिक खनन में कोयले के अंतिम उपयोग की बाध्यता अलग प्रकृति की होती है और इससे खनन विस्तार का आर्थिक प्रोत्साहन बढ़ सकता है। हालांकि, तारा ब्लॉक से होने वाले वास्तविक उत्पादन, निवेश, रोजगार और राजस्व से जुड़े आंकड़े परियोजना के आगे के चरणों और संबंधित सरकारी स्वीकृतियों के बाद ही स्पष्ट रूप से सामने आएंगे।

हाथियों के आवास को लेकर चिंता
हसदेव क्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी लंबे समय से पर्यावरणीय बहस का प्रमुख विषय रही है। वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि खनन, सड़क निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचे के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनके आवागमन के रास्ते प्रभावित हो सकते हैं।

इसका सीधा संबंध Human-Elephant Conflict से भी जोड़ा जाता है। यदि हाथियों के पारंपरिक रास्ते और भोजन-पानी के प्राकृतिक स्रोत बाधित होते हैं, तो उनके मानव बस्तियों की ओर आने की संभावना बढ़ सकती है। इससे ग्रामीणों और वन्यजीवों दोनों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।LMRSU sounds alarm over escalating human-elephant conflict in Lotha region  - Nagaland TribuneNagaland Tribune

हसदेव के मामले में यह चिंता इसलिए गंभीर है क्योंकि क्षेत्र में पहले भी हाथियों की आवाजाही और मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं सामने आती रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नए खनन प्रोजेक्ट का मूल्यांकन केवल पेड़ों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे वन्यजीव आवास और उसके पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

जंगल के साथ जुड़ी है हजारों लोगों की जिंदगी
हसदेव अरण्य का मुद्दा सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और स्थानीय ग्रामीण समुदायों की आजीविका, संस्कृति और दैनिक जरूरतें जंगल से गहराई से जुड़ी हुई हैं। वन उपज, खेती, जल स्रोत और जंगल पर निर्भर अन्य गतिविधियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में खनन परियोजना आने पर जमीन के उपयोग में बदलाव, विस्थापन, आजीविका और सामुदायिक संसाधनों पर प्रभाव जैसे सवाल भी उठते हैं। यही कारण है कि स्थानीय समुदायों की ओर से लंबे समय से ग्राम सभा, वन अधिकार और पुनर्वास जैसे मुद्दों को उठाया जाता रहा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि किसी भी परियोजना में स्थानीय लोगों की भागीदारी और कानूनी अधिकारों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित होना चाहिए।

300 किलोमीटर पैदल चलकर रायपुर पहुंचे थे ग्रामीण
हसदेव आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अक्टूबर 2021 में क्षेत्र के ग्रामीणों ने लगभग 300 किलोमीटर की पदयात्रा कर रायपुर पहुंचकर अपनी मांगें सरकार के सामने रखी थीं। यह आंदोलन अचानक पैदा हुआ विरोध नहीं था, बल्कि कई वर्षों से चल रहे संघर्ष का हिस्सा था। ग्रामीणों की मुख्य चिंता जंगल और जमीन के साथ-साथ अपनी पारंपरिक आजीविका और अधिकारों को लेकर रही है। समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे को उठाया है।Dhamtari reached a distance of 150 km, when his health deteriorated, 300  villagers returned home, two and a half thousand continued the journey

सरकार के सामने अब कई सवाल
तारा ब्लॉक की नीलामी के बाद राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल हसदेव को लेकर अपनी वर्तमान नीति स्पष्ट करने का है। सरकार यदि खनन को विकास और ऊर्जा जरूरतों के लिए आवश्यक मानती है, तो उसे यह बताना होगा कि पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को कम करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, यदि सरकार हसदेव के जंगल और स्थानीय समुदायों की चिंताओं को गंभीरता से लेती है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि नई खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय सहमति के मानकों को किस तरह लागू किया जाएगा। तारा की नीलामी के बाद बहस अब केवल एक कोयला ब्लॉक तक सीमित नहीं रह गई है। यह सवाल बन गया है कि छत्तीसगढ़ में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा और हसदेव जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र का भविष्य कौन तय करेगा।

नीलामी के बाद आगे की प्रक्रिया क्या होगी?
कोयला ब्लॉक की नीलामी पूरी होना अपने आप में खनन शुरू होने के बराबर नहीं है। किसी भी बड़े खनन प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित कानूनों और नियमों के तहत विभिन्न स्वीकृतियों और प्रक्रियाओं का पालन करना होता है। इसमें पर्यावरणीय मंजूरी, वन संबंधी अनुमति और परियोजना से जुड़े अन्य वैधानिक प्रावधान शामिल हो सकते हैं। इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तारा कोल ब्लॉक के लिए कौन-कौन सी मंजूरियां ली जाती हैं, पर्यावरणीय आकलन में क्या निष्कर्ष सामने आते हैं और स्थानीय समुदायों की आपत्तियों तथा अधिकारों का किस तरह समाधान किया जाता है।Coal block auction 1140 companies involved in technical session

हसदेव अरण्य की कहानी को सिर्फ 'कोयला बनाम जंगल' की बहस में समेटना आसान है, लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। एक तरफ देश की ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतें हैं, तो दूसरी तरफ जंगल, वन्यजीव, जल स्रोत और उन पर निर्भर स्थानीय समुदाय। तारा कोल ब्लॉक की नीलामी ने इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है, क्या विकास की कीमत पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों से चुकाई जाएगी, या सरकार ऐसा रास्ता तलाशेगी जिसमें आर्थिक जरूरतों और हसदेव के संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सके? आने वाले समय में परियोजना से जुड़ी मंजूरियां और सरकार का आधिकारिक रुख इस बहस की दिशा तय करेंगे।