नई दिल्ली। स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार होने वाले डिजिटल कंटेंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में इन प्लेटफॉर्म्स के लिए स्पष्ट रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने की मांग की गई है। इस याचिका में हाल ही में गुरुग्राम में कॉमेडियन प्रणित मोरे के शो के दौरान चर्चा में आए '₹370 की बिरयानी' विवाद का भी उल्लेख किया गया है।

याचिका अधिवक्ता विशाल तिवारी ने दायर की है। उनका कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तेजी से फैलने वाले विवादित, भ्रामक और अपमानजनक कंटेंट को लेकर मौजूदा कानूनी व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और इस क्षेत्र के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाने की आवश्यकता है।

फेक न्यूज और वायरल कंटेंट पर जताई चिंता
याचिका में हाल के उन मामलों का भी जिक्र किया गया है, जिनमें सोशल मीडिया पर यह दावा वायरल हुआ था कि भारत के कुछ न्यायाधीश और केंद्रीय मंत्री सरकारी खर्च पर लंदन में बैडमिंटन प्रतियोगिता में शामिल हुए थे। बाद में इस दावे को भ्रामक बताया गया, लेकिन तब तक यह लाखों लोगों तक पहुंच चुका था। याचिकाकर्ता का कहना है कि सोशल मीडिया पर गलत जानकारी इतनी तेजी से फैलती है कि जब तक फैक्ट-चेक या आधिकारिक स्पष्टीकरण आता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। इससे लोगों का भरोसा प्रभावित होता है और संवैधानिक संस्थाओं की छवि पर भी असर पड़ सकता है।

'एक्शन से पहले हो जाता है नुकसान'
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था अधिकतर मामलों में घटना के बाद सक्रिय होती है। लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वायरल होने वाली सामग्री कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। ऐसे में बाद में की गई कार्रवाई या स्पष्टीकरण नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि चाहे कोई टिप्पणी हास्य, व्यंग्य, बातचीत या मनोरंजन के उद्देश्य से की गई हो, लेकिन सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के कारण उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है और वह राष्ट्रीय स्तर पर विवाद का विषय बन सकती है।

एक्सपर्ट कमेटी बनाने की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिए जाएं कि वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, पॉडकास्ट, स्टैंड-अप कॉमेडी, डिजिटल प्रकाशनों और AI से तैयार होने वाले कंटेंट के लिए स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था बनाए। इसके अलावा भ्रामक, अपमानजनक और मानहानिकारक सामग्री की निगरानी और जांच के लिए विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित करने की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल जवाबदेही के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। अब यह देखना होगा कि अदालत इस मामले की सुनवाई स्वीकार करती है या नहीं और डिजिटल कंटेंट के नियमन को लेकर आगे क्या दिशा-निर्देश जारी करती है।